चार खेमे चौंसठ खूंटे -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

चार खेमे चौंसठ खूंटे -हरिवंशराय बच्चन  -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By  Harivansh Rai Bachchan  Part 1

चल बंजारे

चल बंजारे,
तुझे निमंत्रित करती धरती नई,
नया ही आसमान!
चल बंजारे-

दूर गए मधुवन रंगराते,
तरू-छाया-फल से ललचाते,
भृंग-विहंगम उड़ते-गाते,
प्‍यारे, प्‍यारे।
चल बंजारे,
तुझे निमंत्रित करती धरती नई,
नया ही आसमान!
चल बंजारे-

छूट गई नदी की धारा,
जो चलती थी काट कगारा,
जो बहती थी फाँद किनारा,
मत पछता रे।
चल बंजारे,
तुझे निमंत्रित करती धरती नई,
नया ही आसमान!
चल बंजारे-

दूर गए गिरिवर गवींले,
धरती जकड़े, अम्‍बर कीले,
बीच बहाते निर्झर नीले,
फेन पुहारे।
चल बंजारे,
तुझे निमंत्रित करती धरती नई,
नया ही आसमान!
चल बंजारे-

पार हुए मरूतल के टीले,
सारे अंजर-पंजर ढीले,
बैठ न थककर कुंज-करीले,
धूल-धुआँरे!
चल बंजारे,
तुझे निमंत्रित करती धरती नई,
नया ही आसमान!
चल बंजारे-

चलते-चलते अंग पिराते,
मन गिर जाता पाँव उठाते,
अब तो केवल उम्र घटाते
साँझ-सकारे।
चल बंजारे,
तुझे निमंत्रित करती धरती नई,
नया ही आसमान!
चल बंजारे-

क्‍या फिर पट-परिवर्तन होगा?
क्‍या फिर तन कंचन होगा?
क्‍या फिर अमरों-सा मन होगा?
आस लगा रे।
चल बंजारे,
तुझे निमंत्रित करती धरती नई,
नया ही आसमान!
चल बंजारे-

जब तक तेरी साँस न थमती, थमे न तेरा
क़दम, न तेरा कंठ-गान!
चल बंजारे-

 नभ का निर्माण

शब्‍द के आकाश पर उड़ता रहा,
पद-चिह्न पंखों पर मिलेंगे।

एक दिन भोली किरण की लालिमा ने
क्‍यों मुझे फुसला लिया था,
एक दिन घन-मुसकराती चंचला ने
क्‍यों मुझे बहका दिया था,
एक राका ने सितारों से इशारे
क्‍यों मुझे सौ-सौ किए थे,
एक दिन मैंने गगन की नीलिमा को
किसलिए जी भर पीया था?
आज डैनों की पकी रोमावली में
वे उड़ानें धुँधली याद-सी हैं;
शब्‍द के आकाश पर उड़ता रहा,
पद-चिह्न पंखों पर मिलेंगे।

याद आते हैं गरूड़-दिग्‍गज धनों को
चीरने वाले झपटकर,
और गौरव-गृद्ध सूरज से मिलाते
आँख जो धँसते निरंतर
गए अंबर में न जलकर पंख जब तक
हो गए बेकार उनके, क्षार उनके,
हंस, जो चुगने गए नभ-मोतियों को
और न लौटे न भू पर,
चातकी, जो प्‍यास की सीमा बताना,
जल न पीना, चाहती थी,
उस लगन, आदर्श, जीवट, आन के
साथी मुझे क्‍या फिर मिलेंगे।
शब्‍द के आकाश पर उड़ता रहा,
पद-चिह्न पंखों पर मिलेंगे।

और मेरे देखते ही देखते अब
वक्‍त ऐसा आ गया है,
शब्‍द की धरती हुई जंतु-संकुल,
जो यहाँ है, सब नया है,
जो यहाँ रेंगा उसी ने लीक अपनी
डाल दी, सीमा लगा दी,
और पिछलगुआ बने, अगुआ न बनकर,
कौन ऐसा बेहाया है;
गगन की उन्‍मुक्‍तता में राह अंतर
की हुमासे औ’ उठानें हैं बनातीं,
धरणि की संकीर्णता में रूढि़ के,
आवर्त ही अक्‍सर मिलेंगे।

आज भी सीमा-रहित आकाश
आकर्षण-निमंत्रण से भरा है,
आज पहले के युगों से सौ गुनी
मानव-मनीषा उर्वरा है,
आज अद्भुत स्‍वप्‍न के अभिनव क्षितिज
हर प्रात खुलते जा रहे हैं,
मानदंड भविष्‍य का सितारों
की हथेली पर धारा है;
कल्‍पना के पुत्र अगुआई सदा करते
रहे हैं, और आगे भी करेंगे,
है मुझे विश्‍वास मेरे वंशजों के
पंख फिर पड़कें-हिलेंगे,
फिर गगन-कंथन करेंगे!
शब्‍द के आकाश पर उड़ता रहा,
पद-चिह्न पंखों पर मिलेंगे।

कुम्‍हार का गीत

चाक चले चाक!
चाक चले चाक!
अंबर दो फाँक-
आधे में हंस उड़े, आधे में काक!
चाक चले चाक!

चाक चले चाक!
धरती दो फाँक-
आधी में नीम फले, आधी में दाख!
चाक चले चाक!

चाक चले चाक!
दुनिया दो फाँक-
आधी में चाँदी है, आधी में राख!
चाक चले चाक!

चाक चले चाक!
जीवन दो फाँक-
आधे में रोदन है, आधे में राग!
चाक चले चाक!

चाक चले चाक!
बाज़ी दो फाँक,
ख़ूब सँभल आँक-
जुस है किस मुट्ठी, ताक?
चाक चले चाक!

चाक चले चाक!
चाक चले चाक!

जामुन चूती है

अब गाँवों में घर-घर शोर
कि जामुन चूती है।

सावन में बदली
अंबर में मचली,
भीगी-भीगी होती भोर
कि जामुन चूती है।
अब गाँवों में घर-घर शोर
कि जामुन चूती है।

मधु की पिटारी
भौंरे सी कारी,
बागों में पैठें न चोर
कि जामुन चूती है।
अब गाँवों में घर-घर शोर
कि जामुन चूती है।

झुक-झुक बिने जा,
सौ-सौ गिने जा,
क्‍या है कमर में न ज़ोर
कि जामुन चूती है?
अब गाँवों में घर-घर शोर
कि जामुन चूती है।

डालों पे चढ़कर,
हिम्‍मत से बढ़कर,
मेरे बीरन, झकझोर
कि जामुन चूती है।
अब गाँवों में घर-घर शोर
कि जामुन चूती है।

रस के कटोरे
दुनिया के बटोरे,
रस बरसे सब ओर
कि जामुन चूती है।
अब गाँवों में घर-घर शोर
कि जामुन चूती है।

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