चार खेमे चौंसठ खूंटे -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

चार खेमे चौंसठ खूंटे -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 3

 स्‍वाध्‍याय कक्ष में वसंत

शहर का, फिर बड़े,
तिस पर दफ्तरी जीवन–
कि बंधन करामाती–
जो कि हर दिन
(छोड़कर इतवार को,
सौ शुक्र है अल्लामियाँ का,
आज को आराम वे फ़रमा गए थे)
सुबह को मुर्गा बनाकर है उठाता,
एक ही रफ़्तार-ढर्रे पर घुमाता,
शाम को उल्लू बनाकर छोड़ देता,
कब मुझे अवकाश देता,
कि बौरे आम में छिपकर कुहुकती
कोकिला से धडकनें दिल की मिलाऊँ,
टार की काली सड़क पर दौड़ती
मोटर, बसों से, लारियों से,
मानवों को तुच्छ-बौना सिद्ध करती
दीर्घ-द्वार इमारतों से, दूर
पगडंडी पकड़ कर निकल जाऊँ,
क्षितिज तक फैली दिशाएँ पिऊँ,
फागुन के संदेसे कि हवाएँ सुनूँ,
पागल बनूँ, बैठूँ कुंज में,
वासंतिका का पल्लवी घूँघट उठाऊँ,
आँख डालूँ आँख में,
फिर कुछ पुरानी याद ताज़ी करूँ,
उसके साथ नाचूँ,
कुछ पुराने, कुछ नए भी गीत गाऊँ,
हाथ में ले हाथ बैठूँ,
और कुछ निःशब्द भावों की
भँवर में डूब जाऊँ–

किंतु फागुन के संदेसे की हवाएँ
है नहीं इतनी अबल, असहाय
शहर-पनाह से,
ऊँचे मकानों से, दुकानों से,
ठिठकर बैठ जाएँ,
या कि टकराकर लौट जाएँ।
मंत्रियों की गद्दियों से,
फाइलों की गड्डियों से,
दफ्तरों से, अफ़सरों से,
वे न दबतीं;
पासपोर्ट चाहिए न उनको, न वीज़ा।
वे नहीं अभिसारिकाएँ
जो कि बिजली की
चकाचौंधी चमक से
हिचकिचाएँ।
वे चली आती अदेखी,
बिना नील निचोल पहने,
सनसनाती,
और जीवन जिस जगह पर गुनगुनातीं,
सहज, स्वाभाविक, अनारोपित,
वहाँ पर गुनगुनाती,
रहस प्रतिध्वनियां जगातीं,
गुदगुदातीं,
समय-मीठे दर्द की लहरें उठातीं;
(और क्या ये पंक्तियाँ हैं?)
क्लर्कों के व्यस्त दरबों,
उल्लुओं के रात के अड्डों,
रूप-वाक्पटुता-प्रदर्शक पार्टियों से,
होटलों से, रेस्त्रांओं से,
मगर उनको घृणा है।

आज छुट्टी;
आज मुख पर क्लार्की चेहरा लगाकर
असलियत अपनी छिपानी नहीं मुझको,
आज फिर-फिर फ़ोन कि आवाज
अत्याचार मेरे कान पर कर नहीं सकती,
आज टंकनकारियों के
आलसी फ़ाइल, नोटिसें पुर्जियां,
मेरी जी नहीं मिचला सकेंगी।
आज मेरी आँख अपनी,कान अपनी,नाक अपनी।
इसीलिए आज
फागुन के संदेसे की हवाओं की
मुझे आहट मिली है
पत्र-पुस्तकें चित्र-प्रतिमा-फूलदा
सजीव इस कवि कक्ष में
जिसकी खुली है एक खिड़की
लॉन से उठती हुई हरियालियों पर,
फूल-चिड़ियों को झुलाती डालियों पर,
और जिसका एक वातायन
गगन से उतरती नव नीलिमाओं पर
खुला है।
बाहरी दीवार का लेकर सहारा
लोम-लतिका
भेद खिड़की पर मढ़ी जाली अचानक
आज भीतर आ गई है
कुछ सहमती,सकपकाती भी कि जैसे
गाँव की गोरी अकेली खड़ी ड्राइंगरूम में हो।
एक नर-छिपकली
मादा-छिपकली के लिए आतुर
प्रि…प्रि…करती
आलमारी-आलमारी फिर रही है।
एक चिड़िया के लिए
दो चिड़े लड़ते,चुहचुहाते,फुरफुराते
आ गए हैं–
उड़ गए हैं–
आ गए फिर–
उड़ गए फिर–
एक जोड़ा नया आता!..।
किस क़दर बे-अख्तियारी,बेक़रारी!–
‘नटखटों,यह चित्र तुलसीदास का है,
मूर्ति रमन महर्षि की है.’
किंतु इनके ही परों के साथ आई
फूल झरते नीबुओं की गंध को
कैसे उड़ा दूँ?–
हाथ-कंगन, वक्ष, वेणी, सेज के
शत पुष्प कैसे नीबुओं में बस गए हैं!–
दृष्टि सहसा
वात्स्यायन-कामसूत्र,कुमार-संभव
की पुरानी जिल्द के ऊपर गई है
कीट-चित्रित गीत श्री जयदेव का वह,
वहाँ विद्यापति-पदावली,
वह बिहारी-सतसई है,
और यह ‘सतरंगिनी’;
ये गीत मेरे ही लिखे क्या!
जिए क्षण को
जिया जा सकता नहीं फिर–
याद में ही–
क्योंकि वह परिपूर्णता में थम गया है।
और मीठा दर्द भी
सुधि में घुलाते
तिक्त और असह्य होता।
और यह भी कम नहीं वरदान
ऐसे दिवस
मेरे लिए कम हैं,
और युग से देस-दुनिया
और अपने से शिकायत
एक भ्रम है;
क्योंकि जो अवकाश हा क्षण
सरस करता
नित्य-नीरस-मर्त्य श्रम है,
किंतु हर अवकाश पल को
पूर्ण जीना,
अमर करना क्या सुगम है?

कलश और नींव का पत्‍थर

अभी कल ही
पंचमहले पर
कलश था,
और
चौमहले,
तिमहले,
दुमहले से
खिसकता अब
हो गया हूँ नींव का पत्थर!

काल ने धोखा दिया,
या फिर दिशा ने,
या कि दोनों में विपर्यय;
एक ने ऊपर चढ़ाया,
दूसरे ने खींच
नीचे को गिराया,
अवस्था तो बढ़ी
लेकिन व्यवस्थित हूँ
कहाँ घटकर!

आज के साथी सभी मेरे
कलश थे,
आज के सब कलश
कल साथी बनेंगे।
हम इमारत,
जो कि ऊपर से
उठा करती बराबर
और नीचे को
धँसी जाती निरंतर।

(“यहाँ कलश किसी भवन के ऊँचे भाग का प्रतीक है-
हालाँकि आधुनिक भवन निर्माण कला में कलश
नहीं रक्खा जाता”)

दैत्‍य की देन

सरलता से कुछ नहीं मुझको मिला है,
जबकि चाहा है
कि पानी एक चुल्लू पिऊँ,
मुझको खोदना कूआँ पड़ा है।
एक कलिका जो उँगलियों में
पकड़ने को
मुझे वन एक पूरा कंटकों का
काटकर के पार करना पड़ा है
औ’मधुर मधु के स्वल्प कण का
स्वाद लेने के लिए मैं
तरबतर आँसू,पसीने,खून से
हो गया हूँ;
उपलब्धियाँ जो कीं,
चुकाया मूल्य जो उनका;
नहीं अनुपात उनमें कुछ;
मगर सौभाग्य इसमें भी बड़ा है।

जहाँ मुझमें स्वप्नदर्शी देवता था
वहीं एक अदम्य कर्मठ दैत्य भी था
जो कि उसके स्वप्न को
साकार करने के लिए
तन-प्राण की बाज़ी लगाता रहा,
चाहे प्राप्ति खंडित रेख हो,
या शून्य ही हो।
और मैं यह कभी दावा नहीं करता
सर्वदा शुभ,शुभ्र,निर्मल
दृष्टि में रखता रहा हूँ–
देवता भी साल में छ: मास सोते–
अशुभ,कलुषित,पतित,कुत्सित की
तरफ़ कम नहीं आकर्षित हुआ हूँ–
प्राप्ति में सम-क्लिष्ट–
किंतु मेरे दैत्य की
विराट श्रम की साधना ने,
लक्ष्य कुछ हो,कहीं पर,
हर पंथ मेरा
तीर्थ-यात्रा-सा किया है–
रक्त-रंजित,स्वेद-सिंचित,
अश्रु-धारा-धौत।
मंज़िल जानती है,
न तो नीचे ग्लानि से मेरे नयन हैं,
न ही फूला हर्ष से मेरा हिया है.

बुद्ध के साथ एक शाम

रक्तरंजित साँझ के
आकाश का आधार लेकर
एक पत्रविहीन तरु
कंकाल-सा आगे खड़ा है।
टुनगुनी पर नीड़ शायद चील का,
खासा बड़ा है।

एक मोटी डाल पर है
एक भारी चील बैठी
एक छोटी चिड़ी पंजों से दबाए
जो कि रह-रह पंख
घबराहट भरी असमर्थता से
फड़फड़ाती,
छुट न पाती,
चील कटिया सी नुकीली चोंच से
है बार-बार प्रहार करती,
नोचकर पर डाल से नीचे गिराती,
माँस खाती,
मोड़ गर्दन
इस तरफ़ को उस तरफ़ को
देख लेती;
चार कायर काग चारों ओर
मंडलाते हुए हैं शोर करते।
दूर पर कुछ मैं खड़ा हूँ।

किंतु लगता डाल पर मैं ही पड़ा हूँ;
एक भीषण गरुड़ पक्षी
मांस मेरे वक्ष का चुन-चुन
निगलता जा रहा है;
और कोई कुछ नहीं कर पा रहा है।

अर्थ इसका,मर्म इसका
जब न कुछ भी समझ पड़ता
बुद्ध को ला खड़ा करता–
दृश्य ऐसा देखते होते अगर वे
सोचते क्या,
कल्पना करते? न करते?
चील-चिडियाँ के लिए,
मेरे लिए भी किस तरह के
भाव उनके हिये उठते?

शुद्ध,
सुस्थिरप्रग्य,बुद्ध प्रबुद्ध ने
दिन-भर विभुक्षित चील को
सम्वेदना दी,
तृप्ति पर संतोष,
उनके नेत्र से झलका,
उसी के साथ
चिड़िया के लिए संवेदना के
अश्रु ढलके,
आ खड़े मेरे बगल में हुए चल के,
प्राण-तन-मन हुए हल्के,
हाथ कंधे पे धरा,
ले गए तरु के तले,
जैसे बे चले ही पाँव मेरे चले?
नीचे तर्जनी की,
बहुत से छोटे-बड़े,रंगीन,
कोमल-करूण-बिखरे-से
परों से,
धरनि की धड़कन रुकी-सी ह्रत्पटी पर,
प्रकृति की अनपढ़ी लिपि में,
एक कविता सी लिखी थी!

पानी मारा एक मोती
आग मरा आदमी

आदमी:–

जा चुका है,
मर चुका है,
मोतियों का वह सुभग पानी
कि जिसकी मरजियों से सुन कहानी,
उल्लसित-मन,
उर्ज्वसित-भुज,
सिंधु कि विक्षुब्ध लहरे चीर
जल गंभीर में
सर-सर उतरता निडर
पहुँचा था अतल तक;
सीपियों को फाड़,
मुक्ता-परस-पुलकित,
भाग्य-धन को मुठ्ठियों में बांध,
पूरित-साध,
ऊपर को उठा था;
औ’हथेली पर उजाला पा
चमत्कृत दृग हुआ था।
दैत्य-सी दुःसाहसी होती जवानी!
आज इनको
उँगलियों में फेर फिर-फिर
डूब जाता हूँ
विचारों की अगम गहराईयों में,
और उतरा
और अपने-आप पर ही मुस्कुरा कर
पूछता हूँ,
क्या थी वे थे
जिनके लिए
मदिरा-सी पी
वाड़व विलोरित,क्षुधित पारावार में मैं धँस गया था ।
कौन सा शैतान
मेरे प्राण में,

मोती:–

मंद से हो
मन्दतर-तम
बंद-सी वे धड़कने अब हो गई हैं
आगवाली,रागवाली,
गीतवाली,मंत्रवाली,
मुग्ध सुनने को जिन्हें
छाती बिंधा डाली कभी थी,
और हो चिर-मुक्त
बंधन-माल अंगीकार की थी;
साँस की भी गंध-गति गायब हुई-सी;
क्या भुजाएँ थी यही
दृढ-निश्चयी,विजयी जिन्होंने
युग-युगांत नितांत शिथिल जड़त्व को
था हुआ,छेड़ा गुदगुदाया—
आः जीने के प्रथम सुस्पर्श-
हर्षोत्कर्ष को कैसे बताया जाए–
क्या थीं मुठ्ठियाँ ये वही
जिनकी जकड़ में आ
मुक्ति ने था पूर्व का प्रारब्ध कोसा!
फटी सीपी थी नहीं
कारा कटी थी
निशा तिमरावृत छटी थी
और अंजलिपुटी का
पहला सुहाता मनुज-काया ताप
भाया था, समय था नसों में,नाड़ियों में।
खुली मुट्ठी थी
कि दृग में विश्व प्रतिबिम्बित हुआ था;
और अब वह लुप्त सहसा;
मुट्ठियाँ ढीली,उँगलियाँ शुष्क,ठंढी-सी,
विनष्टस्फूर्ति,मुर्दा।
क्या यही वे थीं कि जिनके लिए
अन्तर्द्वन्द्व,हलचल बाहरी सारी सहारी!

तीसरा हाथ

एक दिन
कातर ह्रदय से,
करूण स्वर से,
और उससे भी अधिक
डब-डब दृगों से,
था कहा मैंने
कि मेरा हाथ पकड़ो
क्योंकि जीवन पंथ के अब कष्ट
एकाकी नहीं जाते सहे।

और तुम भी तो किसी से
यही कहना चाहती थी;
पंथ एकाकी
तुम्हें भी था अखरता;
एक साथी हाथ
तुमको भी किसी का
चाहिए था,
पर न मेरी तरह तुमने
वचन कातर कहे।

खैर,जीवन के
उतार-चढाव हमने
पार कर डाले बहुत-से;
अंधकार, प्रकाश
आंधी, बाढ़, वर्षा
साथ झेली;
काल के बीहड़ सफर में
एक दूजे को
सहारा और ढारस रहे।
लेकिन,
शिथिल चरणे,
अब हमें संकोच क्यों हो
मानने में,
अब शिखर ऐसा
कि हम-तुम
एक-दूजे को नहीं पर्याप्त,
कोई तीसरा ही
हाथ मेरा औ’ तुम्हारा गहे।

दो चित्र

–यह कि तुम जिस ओर जाओ
चलूँ मैं भी,
यह कि तुम जो राह थामो
रहूँ थामे हुए मैं भी,
यह कि कदमों से तुम्हारे
कदम अपना मैं मिलाए रहूँs..।
यह कि तुम खींचो जिधर को
खिंचूं,
जिससे तुम मुझे चाहो बचाना
बचूँ:
यानी कुछ न देखूँ,कुछ न सोचूँ
कुछ न अपने से करूँ–
मुझसे न होगा:
छूटने को विलग जाने,
ठोकरे खाने: लुढ़कने, गरज,
अपने आप करने के लिए कुछ
विकल चंचल आज मेरी चाह।

–यह कि अपना लक्ष्य निश्चित मैं न करता,
यह कि अपनी राह मैं चुनता नहीं हूँ,
यह कि अपनी चाल मैंने नहीं साधी,
यह कि खाई-खन्दकों को
आँख मेरी देखने से चूक जाती,
यह कि मैं खतरा उठाने से
हिचकता-झिझकता हूँ,
यह कि मैं दायित्व अपना
ओढ़ते घबरा रहा हूँ–
कुछ नहीं ऐसा।
शुरू में भी कहीं पर चेतना थी,
भूल कोई बड़ी होगी,
तुम सम्भाल तुरंत लोगे;
अन्त में भी आश्वासन चाहता हूँ
अनगही नहीं है मेरी बाँह।

मरण काले

(निराला के मृत शरीर का चित्र देखने पर)

मरा
मैंने गरुड़ देखा,
गगन का अभिमान,
धराशायी, धूलि धूसर, म्लान!

मरा
मैंने सिंह देखा,
दिग्दिगंत दहाड़ जिसकी गूँजती थी,
एक झाड़ी में पड़ा चिर-मूक,
दाढ़ी-दाढ़ चिपका थूक।

मरा
मैंने सर्प देखा,
स्फूर्ति का प्रतिरूप लहरिल,
पड़ा भू पर बना सीधी और निश्चल रेख।

मरे मानव सा कभी मैं
दीन, हीन, मलीन, अस्तंगमितमहिमा,
कहीं, कुछ भी नहीं पाया देख।

क्या नहीं है मरण
जीवन पर अवार प्रहार?–
कुछ नहीं प्रतिकार।

क्या नहीं है मरण
जीवन का महा अपमान?–
सहन में ही त्राण।

क्या नहीं है मरण ऐसा शत्रु
जिसके साथ,कितना ही सम कर,
निबल निज को मान,
सबको,सदा,
करनी पड़ी उसकी शरण अंगीकार?–

क्या इसी के लिए मैंने
नित्य गाए गीत,
अंतर में संजोए प्रीति के अंगार,
दी दुर्नीति को डंटकर चुनौती,
गलत जीती बाजियों से
मैं बराबर
हार ही करता गया स्वीकार,–
एक श्रद्धा के भरोसे
न्याय,करुणा,प्रेम–सबके लिए
निर्भर एक ही अज्ञात पर मैं रहा
सहता बुद्धि व्यंग्य प्रहार?

इस तरह रह
अगर जीवन का जिया कुछ अर्थ,
मरण में मैं मत लगूँ असमर्थ!

Leave a Reply