चारे जग्गे चहु जुगी पंचायन प्रभ आपे होआ ॥-बाबे नानक देव जी दी वार-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji 

चारे जग्गे चहु जुगी पंचायन प्रभ आपे होआ ॥-बाबे नानक देव जी दी वार-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

चारे जग्गे चहु जुगी पंचायन प्रभ आपे होआ ॥
आपे पट्टी कलम आप आपे लिखणहारा होआ ॥
बाझ गुरू अंधेर है खह खह मरदे बहु बिध लोआ ॥
वरत्या पाप जगत्त्र ते धउल उडीना निसदिन रोआ ॥
बाझ दया बल हीन हो निघ्घर चले रसातल टोआ ॥
खड़ा इक ते पैर ते पाप संग बहु भारा होआ ॥
थंमे कोइ न साध बिन साध न दिस्सै जग विच कोआ ॥
धरम धौल पुकारै तले खड़ोआ ॥22॥

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