चारि पुकारहि ना तू मानहि-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

चारि पुकारहि ना तू मानहि-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

चारि पुकारहि ना तू मानहि ॥
खटु भी एका बात वखानहि ॥
दस असटी मिलि एको कहिआ ॥
ता भी जोगी भेदु न लहिआ ॥१॥
किंकुरी अनूप वाजै ॥
जोगीआ मतवारो रे ॥१॥ रहाउ ॥
प्रथमे वसिआ सत का खेड़ा ॥
त्रितीए महि किछु भइआ दुतेड़ा ॥
दुतीआ अरधो अरधि समाइआ ॥
एकु रहिआ ता एकु दिखाइआ ॥२॥
एकै सूति परोए मणीए ॥
गाठी भिनि भिनि भिनि भिनि तणीए ॥
फिरती माला बहु बिधि भाइ ॥
खिंचिआ सूतु त आई थाइ ॥३॥
चहु महि एकै मटु है कीआ ॥
तह बिखड़े थान अनिक खिड़कीआ ॥
खोजत खोजत दुआरे आइआ ॥
ता नानक जोगी महलु घरु पाइआ ॥४॥
इउ किंकुरी आनूप वाजै ॥
सुणि जोगी कै मनि मीठी लागै ॥१॥ रहाउ दूजा ॥1॥12॥886॥

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