चल रे! चल रे! थके बटोही! थोडी दूर और मंजिल है-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

चल रे! चल रे! थके बटोही! थोडी दूर और मंजिल है-नदी किनारे-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

चल रे! चल रे! थके बटोही! थोड़ी दूर और मंज़िल है ।

माना पैर नहीं अब बढ़ते,
और प्यास से प्राण तड़पते,
फूट पत्थरों से जल पड़ता पर जब होती प्यास प्रबल है ।
चल रे! चल रे! थके बटोही! थोड़ी दूर और मंज़िल है ।

देख ज़रा-सा है वह निर्झर,
लेकिन चीर पहाड़ों का उर,
बढ़ता जाता है निज पथ पर,
तू मानव है जिसके कंपन में सोती जग की हलचल है ।
चल रे! चल रे! थके बटोही! थोड़ी दूर और मंज़िल है ।

प्यासा ही तो तुझे समझकर,
बनता जाता पथ विस्तृततर,
खुद को प्यासा कहकर मानव करता खुद से भारी छल है ।
चल रे! चल रे! थके बटोही! थोड़ी दूर और मंज़िल है ।

Leave a Reply