चल बसे-नानक सिंह -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nanak Singh

चल बसे-नानक सिंह -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nanak Singh

मकरो फरेब चल बसे अब दिन शबाब के।
भड़काने लगी है मौत भी सिर जनाब के।

जब वक्त था हजूर का तब ऐश किया खूब,
सामान सजाए रहे दूल्हा नवाब के।

जिनको न थे नसीब कभी जाम के दीदार,
गटकाए उन्होंने शीशे हजारों शराब के।

इस कौम के शिकार का उनको जो हुआ शौक,
कटवाए गए बच्चे भी खाना खराब के।

पर अब है हवा और, जमाना भी और है,
खिलते हैं उजड़े बाग में अब गुल गुलाब के।

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