चलो सजदों में झुक जायें-ग़ज़लें-मोहनजीत कुकरेजा -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mohanjeet Kukreja Ghazals

चलो सजदों में झुक जायें-ग़ज़लें-मोहनजीत कुकरेजा -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Mohanjeet Kukreja Ghazals

सांस बोझल है इन दिनों, फ़ज़ा भी कुछ भारी है
दिलों में मायूसी है और आँखों में अश्क-बारी है!

चेहरे सब सहमे हुए, सारे जहाँ में ख़ौफ़ तारी है
दहशत का माहौल, कैसी मनहूस ये आज़ारी है!

किस क़दर इस दौर में, बेबसी आज हमारी है
फ़िक्रमंद निगाहें हैं, हरेक चेहरे पर लाचारी है!

अंजाम को क़रीब पाके, थर्रायी ख़ल्क़त सारी है
किसीके बस में कुछ नहीं, पूरी दुनिया हारी है!

आदम के इस बच्चे में लेकिन अब तलक मक्कारी है
दो गज़ ज़मीन और हवा की भी चोर-बाज़ारी है!

एक तरफ़ इस वबा का, क़हर ब-दस्तूर जारी है
उसपे ये आलम, अदवियात की भी मारा-मारी है!

अब तो गुनाहों को, बख़्शवाने में समझदारी है
सजदों में झुक जाने में, अब कैसी शर्मसारी है!

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