चलते-फिरते पहाड़-अपने खेत में -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

चलते-फिरते पहाड़-अपने खेत में -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

तुम्हारी आँखें छोटी हैं
दाँत बड़े-बड़े हैं—
बाहर निकले हुए, झक सफेद
डील-डौल भारी है
तुम काले हो
शाकाहारी जीव
लम्बी सूँड़ ही तुम्हारी नाक है
अपनी सूँड़ से
आप कई काम लेते हो
धीर प्रकृति के
ओ चलते-फिरते पहाड़ !
अजी, तुम्हें छोटी-छोटी बातों पर
गुस्सा नहीं आता
कभी आ भी जाए तो
अपने क्रोध पर
तुम्हारा नियन्त्रण जग जाहिर है
तुम्हारा सेवक (महावत) ही
सच्चा सखा होता है तुम्हारा
तुम भुलक्कड़ कतई नहीं हो !

केरल के ‘गुरूवायूर’ देवस्थान के परिसर में
चालीस है तुम्हारी तादाद
सुना है, वहाँ तुम्हारे महानायक की
अर्धांगिनी का प्राणान्त हुआ
तब आपने कई दिनों तक
अन्न-जल त्याग दिया था
तुम्हारा ‘महाशोक’ तब कैसे कम हुआ ?
बतलाओ भी तो जरा !
ओर धीर प्रकृति के चलते-फिरते पहाड़ ?

(18.1.96)

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