चतुर्दश सर्ग-सत्य का स्वरूप-विभु-विभूति-पारिजात-अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

चतुर्दश सर्ग-सत्य का स्वरूप-विभु-विभूति-पारिजात-अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’,-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ayodhya Singh Upadhyay Hariaudh,

भरा है नभतल में भरपूर।
कौन-से श्यामल तन का रंग।
मिले किसके कर का अवलंब।
अधर में उड़े असंख्य पतंग॥1॥

किस अलौकिक विभु का बन भव्य।
आरती करती है सब काल।
जगमगाती जगतीतल-ज्योति।
गगन में अगिणत दीपक बाल॥2॥

किसे अर्पित होता है नित्य।
उषा के अन्तर का अनुराग।
चाँदनी खिलती मिलती है।
लाभ कर किसका दिव्य सुहाग॥3॥

बताता है किसको रसधाम।
बरस, घन, नभ में हो समवेत।
किया करता है उन्नत मेरु।
उच्चता का किसका संकेत॥4॥

किसे देते हैं पादप-वृन्द।
बहु नमित हो फल का उपहार।
पिन्हाती हैं लतिकाएँ रीझ।
किसे कल कुसुमावलि का हार॥5॥

किसे नदियाँ कर कल-कल नाद।
सुनाती हैं अति सुन्दर तान।
याद कर किसको विपुल विहंग।
किया करते हैं मंजुल गान॥6॥

उठा करती है उदधिक-तरंग।
चूमने को किसका पग पूत।
वितरता है सौरभ-संभार।
मलय-मारुत बन किसका दूत॥7॥

तिमिर में है जगती भव-ज्योति।
भाव में है सच्ची अनुभूति।
विलोकें क्यों न दृगों को खोल।
कहाँ है विभु की नहीं विभूति॥8॥

सनातन धर्म
छप्पय
(2)

वह लोकोत्तर सत्य नियति का जो है धाता।
भव की अनुभव-पूत भक्ति का जो है दाता।
वर विवेक-विज्ञान-नयन का जो है तारा।
पाकर जिसकी ज्योति जगमगाया जग सारा।
हैं भुक्ति-मुक्ति जिसकी प्रिया शुचितम जिसका कर्म है।
सब काल एकरस जो रहा वही सनातन धर्म है॥1॥

वंदनीयतम वेदमन्त्रा उसके हैं ज्ञापक।
सकलागम हैं परम अगम महिमा के मापक।
उसकी विभुता विविध उपनिषद हैं बतलाते।
सा नियमन नियम स्मृति सकल हैं सिखलाते।
उसके आदर्श पुराण के कथानकों में हैं कथित।
भारत-से अनुपम ग्रंथ में उसकी गरिमा है ग्रथित॥2॥

मानवता का मूल सदाशयता का मं र।
सदाचार कमनीय स्वर्ग का पूज्य पुरंदर।
भव-सभ्यता-सुमेरु दिव्यता का कल केतन।
लोक-शान्ति का सेतु भव्य भावना-निकेतन।
नायक है सकल सुनीति का, नैतिक बल का है जनक।
है वह पारस जिसको परस लोहा बनता है कनक॥3॥

सर्वभूत-हित-महामन्त्रा का सबल प्रचारक।
सदय हृदय से एक-एक जन का उपकारक।
सत्य भाव से विश्व-बंधुता का अनुरागी।
सकल-सिध्दि-सर्वस्व सर्वगत सच्चा त्यागी।
उसकी विचार-धारा धारा के धार्मों में है बही।
सब सार्वभौम सिध्दान्त का आदि प्रवर्तक है वही॥4॥

बुध्ददेव के धर्मभाव में वही समाया।
उसको ही जरदश्त-हृदय में विलसित पाया।
है ईसा की दिव्य उक्ति का वही विधाता।
वही मुहम्मद की विभूति का है निर्माता।
अवनीतल का सारा तिमिर उसके टाले ही टला।
वह है वह पलना सकल-मत-शिशु जिस पलने में पला॥5॥

पशु मानव हो गये लाभ कर दिव्य सहारा।
पावन बने अनेक अपावन जिसके द्वारा।
जो दे-दे बहु कष्ट लोक-कंटक कहलाया।
उसने कुसुम-समान उसे भी रुचिर बनाया।
सिदियन-सी कितनी जातियाँ चारु रंगतों में ढलीं।
पाकर उसको सुधारीं सधीरें सफल बनीं फूलीं-फलीं॥6॥

उसके खोले खुले बड़े पेचीले ताले।
उसने सुलझा दिये, गये जो उलझन डाले।
खुली कौन-सी ग्रंथि नहीं उसके कर द्वारा।
दिया उसी ने तोड़ विश्व का बन्धान सारा।
देश काल को देख कब बना नहीं वह दिव्यतर।
कब उसने गति बदली नहीं समय-प्रगति अवलोककर॥7॥

है उसमें वह भूति जो असुर को सुर कर दे।
है उसमें वह शान्ति शान्ति जो भव में भर दे।
है उसमें वह शक्ति पतित को पूत बनाये।
है उसमें वह कान्ति रजकणों को चमकाये।
जिससे अमनुजता असमता सब दिन रहती है डरी।
उसकी उदारतम वृत्तिक में वह उदारता है भरीे॥8॥

अचल हिमाचल उठा शीश गुणगण गाता है।
पावनता सुरसरित का सलिल बतलाता है।
गाकर गौरव-गीत विबुध बल-बल जाते हैं।
अवनीतल में कीत्तिक-पताके लहराते हैं।
उसकी संस्कृति के सूत्र से सुख-वितान जग में ताना।
उसके बल से संसार में भारत-मुख उज्ज्वल बना॥9॥

ऐसा परम पुनीत सनातन धर्म निराला।
दूर क सब तिमिर दिखा बहु दिव्य उजाला।
भ्रम-प्रमाद-वश कभी न वह अनुदार कहाये।
सब उससे सुर-तरु-समान वांछित फल पाये।
जल पवन रवि-किरण-सम उसे।
मनुज-मात्रा अपना कहे।
सा वसुधातल में सदा।
शान्ति-सुधा-धारा बहे॥10॥

भाव-विभूति
(3)

बहुत सूखे हृदयों को सींच।
सरसता कर असरस को दान।
दया है उस द्रविता का नाम।
बरस जाये जो जलद-समान॥1॥

सुन जिसे श्रवण हो सुधा-सिक्त।
सुनाये हृत्तान्त्री वह राग।
क जो जन-रंजन सब काल।
वही है आरंजित अनुराग॥2॥

है सरस भावुकता-परिणाम।
करुण रस का उर में संचार।
कहाँ तब पाया हृदय पसीज।
दृगों में बही न जो रस-धार॥3॥

शान्ति-जननी सत्यता-विभूति।
पूततम भावों की हैं पूत्तिक।
मही में है बहु महिमावान।
दिव्य है मानवता की मूर्ति॥4॥

कान्त कृति-रत्न राजि खनि मंजु।
सुरुचि-स्वामिनी सुअनुभवनीय।
परम कामदा साधना-सिध्दि।
सुमति है कामधेनु कमनीय॥5॥

ललित रुचि है कुसुमालि-समान।
कल्पतरु-से हैं भाव ललाम।
लोक-अभिनन्दन कान्त नितान्त।
शील है नन्दन-वन अभिराम॥6॥

मलिन मन को धो हर तन-ताप।
खोलता है सुरपुर की राह।
धारा में सदाचार सब काल।
सुरसरी का है पूत प्रवाह॥7॥

रहे जिससे जीवन का रंग।
वही है बहु कमनीय उमंग।
हंस जिससे मुक्ता पा जाय।
वही है मानस-मंजु-तरंग॥8॥

प्रेमाश्रु
(4)

सिंची बहु सरस बन-बन जिससे
वह मानवता-क्यारी।
जिसमें विकसित मिली रुचिर रुचि
की कुसुमावलि सारी।
जिसकी बूँद-बूँद में ऐसे
सिक्त भाव हैं पाते।
जिसके बाल से नीरस उर भी
हैं रसमय बन जाते॥1॥

जिसमें अललित लोभ की लहर
कभी नहीं लहराती।
जिसमें छल-बल की प्रपंच की
भँवर नहीं पड़ पाती।
जिसमें विविध विरोधा वैर के
बुद्बुद नहीं दिखाते।
जिसने कलह-कपट-कुचाल के
है शैवाल न पाते॥2॥

सदा डूब जाती है जिसमें
अहितकारिता-नौका।
मिली न जिसमें रुधिकर-पान-रत
कुत्सित नीति-जलौका।
जिसमें मद-मत्सर-प्रसूत वह
वेग नहीं मिल पाता।
पड़ जिसके प्रपंच में जनहित-
पोत टूट है जाता॥3॥

जिसकी सहज तरलता है
पविता को तरल बनाती।
जिसकी द्रवणशीलता है
वसुधा में सुधा बहाती।
जिसके पूत प्रवाह से धुले
मानस का मल सारा।
नहीं नयन से क्यों बहती वह
प्रेम-अश्रु की धारा॥4॥

प्रेम-तरंग
छप्पै
(5)

वसुधा पर विधु-सदृश सुधा है वह बरसाता।
वह है जलद-समान जगत का जीवन-दाता।
वही सदा है कामधेनु कामद कहलाता।
वही कल्पतरु-तुल्य बहु फलद है बन पाता।
जो जन-रंजित हो सके भव-अनुरंजन-रंग से।
जिसका मानस हो लसित पावन प्रेम-तरंग से॥1॥

सत्य-सन्देश
(6)

भक्त-जन-रंजन की वर भक्ति।
कगी किस उर में न प्रवेश।
रुचिर जीवन न बनेगा कौन।
सुन सुरुचि-भरित सत्य-सन्देश॥1॥

जगेगा भला न किसका भाग।
लगेगा किसे न प्यारा देश।
बनेगा कौन न शुचिता-मूर्ति।
हृदय से सुने सत्य-सन्देश॥2॥

परम भय-संकुल हो सब काल।
अभय करता है वर आदेश।
तरंगाकुल भव-सिंधु-निमित्त।
पोत है पूत सत्य-सन्देश॥3॥

दूर करता है तम-अज्ञान।
हटाता है भव-रजनी-क्लेश
उरों में जगा ज्ञान की ज्योति।
भानुकर-सदृश सत्य-सन्देश॥4॥

सत्य-सन्देश
(7)

सुन जिसे भव जाता है भूल।
स्वर्ग की सरस सुधा का स्वाद।
भरित मिलता है किसमें भूरि।
भारती-वीणा का वह नाद॥1॥

सुन जिसे मति होती है मुग्ध।
उमग नर्त्तन त्याग।
विपुल पुलकित बनती है भक्ति।
मिला किसमें वह अनुपम राग॥2॥

सुन पड़ा जिसमें अनहद नाद।
हुआ जिसमें समाधिक-धन-गीत।
सुरति है जिसकी सहज विभूति।
मिला किसमें वह श्रुति-संगीत॥3॥

रूप किसका है भव-अनुराग।
लोक-हित-व्रत है किसका वेश।
सुर-विटप-सदृश फलद है कौन।
भूत-हित-पूत सत्य-सन्देश॥4॥

विवाह

(8)
पूततम है विधन विधिक का।
नियति का है नियमित नियमन।
प्रकृति का है अनुपम आशय।
वेद का वन्दित अनुशासन॥1॥

वंश-वर्ध्दक वसुधा-हित-रत।
सदाचारी सपूत को जन।
क्षेत्रा में विश्व-सृजन के वह।
सदा करता है बीज-वपन॥2॥

शान्ति का है वर आवाहन।
सुकृति का संयत आराधन।
मधुरता का विकास मधुमय।
सरसता का सुन्दर साधन॥3॥

रमा का रंजन होता है।
गिरा गौरवित दिखाती है।
मंजुतम मूर्ति त्याग की बन।
सती सत उससे पाती है॥।4॥

विलसता सुरतरु है उसमें।
मलय-मारुत बह पाता है।
स्वर्ग-जैसा सुन्दर उससे।
गृही का गृह बन जाता है॥5॥

बालकों का विधु-सा मुखड़ा।
नयन को कैसे दिखलाता।
सुधारस कानों में कैसे।
मृदु वचन उनका बरसाता॥6॥

अलौकिक रत्न लाभ कर क्यों।
दिव्य जगतीतल बन जाता।
लाल माई के क्यों मिलते।
जो न जुड़ता पावन नाता॥7॥

भूति से उसकी जल-पय-सम।
एक हो जाते हैं दो मन।
मिलाता है दो हृदयों को।
मुक्ति-साधन विवाह-बंधन॥8॥

धर्म-धारणा
(9)

सहज सनातन धर्म हमारा।
परम अपावन जन-निमित्त है पावन सुरसरि-धारा।
भव-पथ के भूले-भटके को दिव्य-ज्योति धारुव-तारा।
पाप-पुंज-रत पामर नर को खरतर असि की धारा।
सकल काल अभिमत फलदायक है सुरुतरु-सा न्यारा।
विविध-रोग-उपशम-अधिकारी है परिशोधिकत पारा।
ज्ञान-निकेतन अखिल सिध्दि-साधना-सदन श्रुति प्यारा।
भुक्ति-मुक्ति वर भक्तिविधायक सिध्द-समाधिक-सहारा।
त्रिककालज्ञ सर्वज्ञ तपोधन ने है उसे सुधारा।
ले अवतार आप विभुवर ने प्राय: उसे उबारा।
वह विकास है वह जिससे विकसित है अनुभव सारा।
धारा-ज्ञान-विज्ञान दिव्य लोचन का है वह तारा।
भू के सकल पंथ मत में है उसका प्रबल प्रसारा।
नभ में दीपक बले उसी की जगी ज्योति के द्वारा।
सँभल उसी की पूत शान्ति के कर से हुए उतारा।
मधुर बन सकेगा वसुधातल का अशान्ति-जल खारा॥1॥

उद्बोधन
(10)

किसी की उँगली का संचार।
भर सका जिसमें बहु प्रिय राग।
हो सका जिसमें ध्वनित सदैव।
भूतभावन-पावन-अनुराग॥1॥

सुनाता है भवहित-संगीत।
छिड़े पर जिसका अनुपम तार।
खोल देती है हृदय-कपाट।
सुझंकृत हो जिसकी झंकार॥2॥

सुने जिसका बहु व्यंजक बोल।
सुरुचि सकती है शुचि पर पूज।
मानसों को करती है पूत।
सुगुंजित हो-हो जिसकी गूँज॥3॥

पान कर जिसका रस स्वर्गीय।
कान बन सका सुधा का पात्रा।
उस अलौकिक तंत्री का नाद।
सुने वसुधातल-मानवमात्रा॥4॥

(11)

सती ने किससे पाई सिध्दि।
रमा ने कान्ति परम कमनीय।
गिरा किससे पाये अनुभूति।
बनी सब भव में अनुभवनीय॥1॥

लाभ कर किससे दिव्य विकास।
हुए उद्भासित सा ओक।
अलौकिकता किसकी अवलोक।
लोक को मिला विपुल आलोक॥2॥

मिली दिनमणि को किससे ज्योति।
कलानिधि को अति कोमल कान्ति।
समुज्ज्वल किससे हुए दिगन्त।
पा सकी वसुधा किससे शान्ति॥3॥

कौन है भव का सुन्दर भाव।
कौन है शिव-ललाट की लीक।
धारातल के सा शुभ कर्म।
कहाये किससे कान्त प्रतीक॥4॥

भाल पर किसके है वह तेज।
काँपता है जिससे तम-पुंज।
विलोके किसकी प्रगति ललाम।
भव-अहित-दल बनते हैं लुंज॥5॥

कौन है वह कमनीय प्रवाह।
झलकता है जिसमें विभु-विम्ब।
देखते हैं किसमें बुध-वृन्द।
क्यों मिलित हुए बिम्ब-प्रतिबिम्ब॥6॥

कौन है वह विस्तृत आकाश।
मिल गये जिसका निर्मल अंक।
चमकते हैं बन-बन बहु कान्त।
लोक-हित नाना मंजु मयंक॥7॥

दिव्यताएँ उसकी अवलोक।
दिव्यतम बनता है भव-कूप।
अपावन जन का है अवलम्ब।
परम पावन है सत्य-स्वरूप॥8॥

(12)

हँसी है कभी उड़ाती उसे।
कभी छलती है मृदु मुसकान।
कभी आँखों के कुछ संकेत।
नहीं करते उसका सम्मान॥1॥

कभी मीठी बातों का ढंग।
दिया करता है परदा डाल।
कभी चालाकी दिखला रंग।
चला करती है उससे चाल॥2॥

झमेले करती हैं उत्पन्न।
कभी लालच की लहरें लोल।
कभी रगड़े करते हैं तंग।
बनाकर उसको डाँवाडोल॥3॥

कभी जी की कसरें धुन बाँधा।
किया करती हैं टाल-मटोल।
देखकर उसका बिगड़ा रंग।
नहीं वह कुछ सकता है बोल॥4॥

धूल कितनी आँखों में झोंक।
कहीं पर बिछा कपट का जाल।
सदा ही बात बना कुछ लोग।
दिया करते हैं उसको टाल॥5॥

वैर के बो-बो करके बीज।
जो घरों में बोते हैं आग।
बहुत ही जले-भुने वे लोग।
न करते कैसे उसका त्याग॥6॥

बोलते ही रहते हैं झूठ।
बहुत लोगों की है यह बान।
जिसे वे करते नहीं पसंद।
करेंगे कैसे उसका मान॥7॥

सदा पाते रहते हैं लोग।
लोक में फल स्वकर्म-अनुरूप।
उन्हें कब नहीं मिला है दंड।
सके जो देख न सत्य-स्वरूप॥8॥

(13)

बिछाकर अलकावलि का जाल।
धाता है उसे बताता काम।
नहीं लग लगने देता-उसे।
कामिनी-कुल का रूप ललाम॥1॥

रोकता है पढ़ मोहन-मन्त्रा।
मोहनी डाल-डालकर मोह।
उसे प्राय: देता है डाँट।
दिखाकर निज दबंगपन द्रोह॥2॥

डराता है कर आँखें लाल।
उसे अभिमानी का अभिमान।
बहुत फैला अपना तमपुंज।
तमक उसको देती है तान॥3॥

पास आने देता ही नहीं।
किया करता है पथ-अवरोधा।
डाल बाधाएँ हो-हो क्रुध्द।
उसे बाधिकत करता है क्रोधा॥4॥

सामने अपने उसे विलोक।
छटकने लग जाता है क्षोभ।
दूर उसको रखने के लिए।
ललचता ही रहता है लोभ॥5॥

देखती उसे आँख-भर नहीं।
काँपती है सुन उसका नाम।
साथ में उसको लेकर चले।
कब चला लम्पटता का काम॥6॥

नहीं अभिनन्दित करता उसे।
परम निन्दित निन्दा का चाव।
मानता है उसको रिपु-तुल्य।
लोक हिंसा-प्रतिहिंसा-भाव॥7॥

बताता उसको हितकर नहीं।
नीचतम मानस-मलिन-स्वभाव।
चाहते हैं भ्रमांधा भव-मध्य।
भाव का उसके परम अभाव॥8॥

मानता मन का उसको नहीं।
जुगुप्सा – लिप्सा – कुत्साधाम।
उसे कहके लालित्य-विहीन।
स्वयं बनता है दंभ ललाम॥9॥

कभी करती है उससे मेल।
कभी बन जाती है प्रतिकूल।
पड़े निज भूल-भूलैयाँ-मध्य।
क्यों न करती प्रवंचना भूल॥10॥

भले ही हो वह भवनिधिक-पोत।
हो सकेगी क्यों उससे प्रीति।
कगी क्यों प्रिय पटुता-संग।
कुटिलता कटुता की कटु नीति॥11॥

जब नहीं तिमिर सकेगी टाल।
क तब क्यों प्रकाश की साधा।
वदन क्यों उसका सके विलोक।
अधामता होती है जन्मांधा॥12॥

कगी कैसे उसे पसंद।
जो कि है परम पुण्य की मुर्ति
सदा है पापरता चित-वृत्तिक।
कुजनता है पामरता-पूत्तिक॥13॥

उलूक-प्रकृति का है दुर्भाग्य।
जो न समझे, न सके अवलोक।
दिवाकर के समान है दिव्य।
सत्य है सकल लोक-आलोक॥14॥

(14)

द्रवित हो बहुत पसीज-पसीज।
दुखित दुख-तिमिर-पुंज को टाल।
झलकती किसकी है प्रिय ज्योति।
करुण रस-धारा में सब काल॥1॥

दान कर देता है सर्वस्व।
समझकर उसे कीत्तिक-उपहार।
कहे किसके बनता है रीझ।
हृदय सहृदय का परम उदार॥2॥

दशा दयनीय जनों की देख।
सदयता को वह सका न रोक।
याद आता है किसका रूप।
दया की दयालुता अवलोक॥3॥

विविध विद्या-बल से कर दूर।
अविद्याजनित विकार-विभेद।
किस भुवन-वंदित का कर साथ।
बन सका वन्दनीय निर्वेद॥4॥

दानवी प्रकृति परम दुर्दान्त।
प्राप्त कर किससे बहु शुचि स्फूत्तिक।
बनी सहृदयता मृदुता-धाम।
सुजनता जनता-ममता-मूर्ति॥5॥

सुधा से कर मरु-उर को सिक्त।
सिता-सी फैला कोमल कान्ति।
हुए किस रजनी-पति से स्नेह।
बन सकी राका-रजनी-शान्ति॥6॥

लाभ कर ममता विश्व-जनीन।
सृजन कर भौतिक शान्ति-विधन।
मिले किसका महान अवलम्ब।
बनी मानवता महिमावन॥7॥

विलोके किसको गौरव-धाम।
गौरवित बनता है गंभीर।
देखकर किसको धर्मधुरीण।
धीरता नहीं त्यागता धीर॥8॥

बना करती है किसे विलोक।
सुमति की मूर्ति परम रमणीय।
सदाशयता सुख्याति सकान्ति।
सुकृति की कीत्तिक-कला कमनीय॥9॥

बढ़ाकर शालीनता-प्रभाव।
शिष्टता में भर भूरि उमंग।
विलसती है किसको अवलोक।
शील मानस महनीय तरंग॥10॥

नाचता है किस घन को देख।
सर्वदा सदाचार-मनमोर।
देखता है किस विधु की कान्ति।
सच्चरित बनकर चरितचकोर॥11॥

जी रही है भव-पूत विभूति।
देखकर किसके मुख की ओर।
कौन है सद्गति का सर्वस्व।
रुचिरतम सुरुचि-चित्त का चोर॥12॥

ज्ञान-विज्ञान-सहित रुचि साथ।
भावनाओं में भर अनुरक्ति।
गयी खिल देखे किसका भाव।
भुवन-भावुकता-भरिता भक्ति॥13॥

विश्व-गिरि-शिखरों पर सर्वत्र।
गड़ गयी गौरव पा अविलम्ब।
धर्म की धवजा उड़ी भव-मध्य।
मिले किसके कर का अवलम्ब॥14॥

दिव्य भावों का है आधार।
नियति का नियमनशील निजस्व।
लोक-पति का है भव्य स्वरूप।
सत्य है भव-जीवन-सर्वस्व॥15॥

(15)

अन्न दे देना भूखों को।
पिलाना प्यासे को पानी।
दीन-दुखिया-कंगालों को।
दान देना बनकर दानी॥1॥

बुरा करना न दूसरों का।
नहीं कहना लगती बातें।
सँभल सेवा उसकी करना।
न कटती हैं जिसकी रातें॥2॥

कभी रखना न मैल दिल में।
चलाना कभी नहीं चोटें।
क्यों न टोटा पर टोटा हो।
पर गला कभी नहीं घोटें॥3॥

काटना जड़ बुराइयों की।
बदी को धाता बता देना।
चाल चल-चल या छल करके।
कुछ किसी का न छीन लेना॥4॥

डराना बेजा धामकाना।
सताना डाँटे बतलाना।
खिजाना साँसत कर हँसना।

दूसरों का दिल दहलाना॥5॥
बुरा है, इसीलिए इनसे।
सदा ही बच करके रहना।
बु भावों की लहरों में।
भूलकर भी न कभी बहना॥6॥

समझना यह, जिन बातों का।
हमें है दुख होता रहता।
सुने, वैसी ही बातों को।
विवश हो कोई है सहता॥7॥

सोचना, यह, दिल का छिलना।
कपट का जाल बिछा देना।
बहँकना मनमाना करना।
बलाएँ हैं सिर पर लेना॥8॥

जानना यह, काँटे बोना।
कुढ़ाना दे-देकर ताना।
कलेजा पत्थर का करना।
बेतरह है मुँह की खाना॥9॥

मूसना माल न औरों का।
चूसना लहू न लोगों का।
बाँधाकर कमर दूर करना।
देश के सा रोगों का॥10॥

खोलना आँखें अंधो की।
राह भूलों को बतलाना।
समझना सब जग को अपना।
काम पड़ गये काम आना॥11॥

बड़ाई सदा बड़ों की रख।
कहे पर कहा काम करना।
जाति के सिरमौरों की सुन।
समय पर उनका दम भरना॥12॥

भागना झूठी बातों से।
धाँधाली से बचते रहना।
कभी जो कुछ कहना हो तो।
सँभल करके उसको कहना॥13॥

बुराई सदा बुराई है।
भलाई को न भूल जाना।
भले का सदा भला होगा।
यह समझना औ’ समझाना॥14॥

जन्तुओं के सुख-दुख को भी।
मानना निज सुख-दुख-ऐसा।
सभी जीवों के जी को भी।
जानना अपने जी-जैसा॥15॥

ह पत्तो की हरियाली।
फूल का खिलना कुम्हलाना।
देखकर, आँखोंवाले वन।
दया उनपर भी दिखलाना16॥

भले कामों के करने में।
न बनना कसर दिखा कच्चा।
भाव बच्चों-जैसा रखना।
सत्य का है स्वरूप सच्चा॥17॥

(16)

शार्दूल-विक्रीडित

जो हो सात्तिवकता भरी न उसमें, जो हो नहीं दिव्यता।
जो हो बोधक नहीं पूत रुचि का, जो हो नहीं शुध्द श्री।
तो है व्यर्थ, प्रवंचना-भरित है, है र्धात्ताता चिद्द ही।
होवे भाल विशाल का तिलक जो सत्यावलम्बी नहीं॥1॥

तो क्या है वह लालिमा तिलक की जो भक्तिरक्ता नहीं।
तो क्या है वह श्वेतता न जिसमें है सात्तिवकी सिक्तता।
खाएँ रमणीय, कान्त रचना, आकार की मंजुता।
तो क्या है उनमें नहीं यदि लसी सत्यादृता पूतता॥2॥

नाना योग-क्रिया-कलाप-विधिक से आराधाना इष्ट की।
पूजा-पाठ-व्रतोपवास-जप की यज्ञादि की योजना।
देवोपासन मन्दिरादि रचना पुण्यांग की पूत्तिकयाँ।
तो क्या हैं यदि साधना-नियम में है सत्य-सत्ता नहीं॥3॥

होती हैं सब सिध्दियाँ करगता अंगीकृता ऋध्दियाँ।
जाती है बन सेविका सफलता सद्वृत्तिक-उद्बोधिकता।
है आज्ञा मतिमानता मनुजता ओजस्विता मानती।
होगी क्यों ऋत कल्पना न उसकी जो सत्य-संकल्प है॥4॥

जो है ज्ञान-निधन कष्ट उसको देगी न अज्ञानता।
जो है लोभ-विहीन तृप्त उसको लेगी न लिप्सा लुभा।
मोहेगी न विमुक्त मुक्तिरत को मुक्तावली-मालिका।
होवेगा वह क्यों असत्य प्रतिभू जो सत्य-सर्वस्व है॥5॥

जो माला फिरती रहे प्रति घटी होगा न तो भी भला।
जो संध्या करते त्रिककाल हम हों तो भी नपेगा गला।
जो हों योग-क्रिया सदैव करते तो भी न होंगे सुखी।
होती है यदि अज्ञता विमुखता से सत्यता वंचिता॥6॥

अन्यों के छिनते न स्वत्व लुटते तो कोटिश: स क्र्या।
क्यों होते नगरादि धवंस बहती क्यों रक्त-धारा कहीं।
कैसे तो कटते कराल कर से लाखों करोड़ों गले।
पृथ्वी हो रत सर्व-भूत-हित में जो सत्य को पूजती॥7॥

क्यों होते बहु वंश धवंस मिलते वे आज फूले-फले।
उल्लू है अब बोलता नित जहाँ होती वहाँ रम्यता।
होता देश वहाँ विशाल अब हैं कान्तार पाते जहाँ।
आस्था से अवलोकती वसुमती जो सत्यता-दिव्यता॥8॥

भूमा में भव में विभूतितन में भू में मनोभाव में।
होते हैं जितने विकार मल या मालिन्य के सूत्र से।
देती हैं उनको निवृत्ता कर वे सद्भाव-सद्बोधा से।
हैं संशोधनशील दिव्य कृतियाँ सत्यात्मिका वृत्तिकयाँ॥9॥

कोई है धन के लिए बहँकता कोई धारा के लिए।
कोई राग-विराग से विवश हो है त्याग देता उसे।
कोई वैर-विरोधा-क्रोधा-मत ले देता उसे है बिदा।
प्यारा है जितना प्रपंच उतना है सत्य प्यारा कहाँ॥10॥

क्या होगा कपड़ा रँगे, सिर मुड़े, काषायधारी बने।
मालाएँ पहने, त्रिकपुंडधार हो, लम्बी जटाएँ रखे।
क्या होगा सब गात में रज मले या वेश नाना रचे।
जो हो इष्ट प्रवंचना बन यती जो हो न सत्यव्रती॥11॥

हो-हो आकुल स्वार्थ है दहलता, आवेश है चौंकता।
तृष्णा है मुँह ढाँकती, कुजनता है पास आती नहीं।
निन्दा है बनती विमूढ़, डर से है भागती दुर्दशा।
देखे आनन सत्य का सहमती हैं सर्व दुर्नीतियाँ॥12॥

तारों में दिव के सदैव किसकी है दीखती दिव्यता।
भूतों में भवभूतिमध्य किसका अस्तित्व पाया गया।
जीवों में तरु-लता आदि तक में है कौन सत्ता लसी।
कैसे तो न असत्य विश्व बनता जो सत्य होता नहीं॥13॥

सारी विश्व-विभूति के विषय का आधार अस्तित्व है।
है अस्तित्व-प्रमाण सत्य वह जो सर्वत्र प्रत्यक्ष है।
अन्तर्दृष्टि समष्टि व्यष्टिगत हो जो दृश्य है देखती।
तो होती रसवृष्टि है हृदय में सत्यात्मिका सृष्टि है॥14॥

है विश्वस्त, विभूतिमान, भव का सर्वस्व, सर्वाश्रयी।
है विज्ञान-निधन, ज्ञान-निधिक का विश्राम, शान्ताश्रयी।
वादों से बहु अन्यथाचरण से वैदग्धा-व्युत्पत्तिक से।
तर्कों से वह क्यों असत्य बनता, है सत्य तो सत्य ही॥15॥

चाहे हो रवि या शशांक अथवा हों व्योमता सभी।
चाहे हों सुरलोक के अधिकप या हों देव देवांगना।
चाहे हो दिव-दामिनी भव-विभा चाहे महाअग्नि हो।
दिव्यों में उतनी मिली न जितनी है सत्य में दिव्यता॥16॥

है रम्या गुरुतामयी सहृदया मान्या महत्ताअधिकतरंकिता।
नाना दिव्य विभूति-भाव-भरिता कान्ता मनोज्ञा महा।
सौम्या शान्ति-निकेतना सदयता की मुर्ति विता।
श्वेताभा-सदना सितासिततरा है सिध्दिदा सत्यता॥17॥

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