चतुर्थ सर्ग-नेत्रभंग (खण्ड काव्य)-नेत्रभंग (खण्ड काव्य)-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

चतुर्थ सर्ग-नेत्रभंग (खण्ड काव्य)-नेत्रभंग (खण्ड काव्य)-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

बाण प्रहार कर
चिन्तित हुए श्री राम
यह क्या है ?
क्यों हुआ ऐसा ?
कैसी व्यवस्था यह ?
कैसा प्रशासन यह ?
कैसा यह तन्त्र है ?
नित्य ही होता
बलात्कार वधुओं पर,
होता है अपमान

राह चलती सतियों का,
उनके स्वजनों-स्वामियों की
उपस्थिति में भी
होता है शील हरण
श्तिशालियों द्वारा-
सत्ताधीशों द्वारा-
उच्च्प्दास्थों, कुलीनों, धनियों द्वारा-
खुले आम,
बिना भय
कैसा यह शासन है ?
यह तो आतंक है,
कलंक मानवता का ।
ऐसे आतंक में
जीना क्या संभव है ?
नारी-देह के भूखे
भयानक नर-भेड़ियों की
कमी नहीं है आज
अपने समाज में,
मुक्त यौनाचारियों की
अपसंस्कृति घटाटोप
छाई है व्योम में,
दिगन्त में – दिग्मंडल में ।
आज बच्चियाँ तक
छेड़ी जातीं,
छोड़ी नहीं जातीं
संतानवती प्रौढ़ाएँ,
नवोढ़ाएँ,
वृद्धाएँ
सब की सब
पतित कामी पुरुषों की
वासना का लक्ष्य हैं ।
कैसा अन्याय है यह ?
कैसा अपमान है यह
प्रकृतिस्वरूपा आद्याशक्ति नारी का ?
नारी का अपमान
घातक है, घातक है ।
नारी के अपमान से
किसी भी राष्ट्र का
उत्थान नहीं हो सकता,
डूब जाता है शीघ्र
नारी उत्पीड़क समाज,
सम्पूर्ण देश होता है
शीघ्र पतित, शीघ्र खण्डित ।
गौरव-सम्मान रहित,
होता विदेश- विजित ।
नारी का अपमान,
बलात्कार, उत्पीड़न
घोर अन्याय है,
घातक उद्दण्डता है ।
किसी भी कीमत पर
उद्दण्डता है दण्डनीय
अपरिहार्य दण्डनीय ।
किन्तु आज दण्डनीय
दण्ड कहाँ पता है ?
उसी के हाथ में
सत्ता है, शक्ति है-
शासन-प्रशासन है-
उसके ही समर्थक हैं
अंधभक्त संख्यातीत,
उसकी प्रशस्तियों से
भरे हैं सब शास्त्र, ग्रन्थ;
निति निर्धारक वह,
नियम-विस्तारक वह,
धर्मोपदेशक वह,
सब कुछ वही है आज
सब कुछ वही है आज
सब कुछ वही है ।
अप्रतिम त्याग-वृत्ति-संयम-सम्पन्न
जिन पूर्वजों ने रचा कभी
सुंदर समाज
शुभ संस्कृति महान दिव्य
सभ्यता सदा वरेण्य
क्या उसको-
मानव प्रजाति के
सर्वोत्तम, बहुमूल्य
प्रेमोपहार को –
नष्ट कर देंगें ये
उद्दण्ड स्वैराचारी ?
कैसी विडम्बना है ?
सम्प्रति समाज के
नेता पथ भ्रष्ट हैं,
सत्ता की बागडोर
भ्रष्टाचारियों के हाथ है ।
हाय भारतवर्ष में –
भरतों की भूमि में –
शत्रु-दल-बल-मर्दन,
हीनों के अपवारक,
हिमगिरी से इन्दुसर-
मध्य अतिशय पवित्र
आर्यों के देश में-
होता है बलात्कार !
पुष्पित है भ्रष्टाचार !
प्रसरित नपुंसकता ?
मानवाधिकार यह ?
नहीं कोई प्रतिरोधक
विरोधी, प्रज्ज्वलित वीर ?
कैसा दुर्भाग्य है ?
आह ! यह भरत-भूमि–
श्रेष्ठ पुरुषों की भूमि–
युद्ध-विस्तारक, रणंजय, स्वनाम धन्य
नर-रत्नों की भूमि–
शत-शत लघु खण्डों में–
राज्यों-उपराज्यों में–
कटी-छँटी, बँटी हुई,
संकीर्ण राष्ट्रीयता की —
खण्डित राष्ट्र चेतना की-
भूमि बन कलथ रही
रक्त-क्लांत
लुंज-पुंज ।
देश जब बँटता है
अगणित लघु राज्यों में
राष्ट्रीयता सिमटती है;
अपाहिज होता है
जातीय-स्वाभिमान–
भुवन-भास्वर शौर्य;
तिरोहित होता है अपना
उज्जवल अतीत,
इतिहास चेतन भी
शीघ्र नष्ट होती है,
बढ़ता है आकर्षण
विदेशी संस्कृतियों के प्रति,
बन जाती विकृति ही
संस्कृति –जीवन-पद्धति,
भ्रष्टाचार बनता है जीवन-मूल्य
अनैतिकता आदर्श ।
चारो ओर घोरतम गरीबी का राज्य आज,
भयंकर अशिक्षा का फैला है अन्धकार
आधि-व्याधि-ग्रस्त, त्रस्त-स्रस्त, अस्त-व्यस्त देश ।
चारो ओर सर्वभक्षी
फैला है भ्रष्टाचार,
व्ही बनता जा रहा
जीवन-मूल्य
जीवन-दर्शन,
नैतिकता का मानदण्ड ।

कैसे होगा उद्धार ?
कैसे होगा कल्याण
सर्वसाधारण मानव का ?
शिशु सा अबोध वह
भ्रान्त, चेतना-विहीन ।
स्व-संस्कृति है मरणासन्न,
धर्म शक्तिहीन,
धर्म हीनता प्रबल है ।
कैसे होगा उद्धार ?
कैसे होगा कल्याण ?
अंकुश लगाना होगा
निरंकुश ऐरावतों को,
दिग्गजों के तोड़ने
होंगे कठोर दन्त ।
वश में करना होगा
विवश कर पथभ्रष्टों को,
शीर्षस्थ पदों पर बैठे
मदान्ध अधिकारियों को,
अन्यथा सबकुछ समाप्त हो जायेगा,
सब कुछ समाप्त हो जायेगा,
सब कुछ ……… ।
खुलेआम जिन पर
लग रहे हैं आरोप
सिद्ध भी हैं हो चुके
अब भी हैं वे ही सत्ताधारी,
पूज्य, सर्वमान्य, धन्य ।

उनके बिना आज
धार्मिक आयोजन तक,
सांस्कृतिक समारोह सभी
अधूरे मन जाते,
लोकमान्य विद्वतजन —
कवि-कोविद-कलावन्त
ऐसे पथभ्रष्टों के हाथों से
प्राप्त कर पुरस्कार–
पशस्ति-लेख-मुद्राएँ–
उपाधियाँ-प्रमाण-पत्र–
मानते स्वयं को धन्य
और कृतकार्य भी ।
बदलते जीवन-मूल्यों का
कैसा परिणाम यह ?
ध्वस्त करना होगा
इस विकृति–
अपसंस्कृति को–
उसकी अवैध संतति
भ्रष्ट आचार को,
अनर्गल, अन्याय को ।
स्वैराचारी राजपुरुष–
शासकों-प्रशासकों को–
सदाचार, शक्ति और सुन्दर चरित्र से
करना होगा ठीक,
लाना सन्मार्ग पर ।
लानी होगी पुनः
उत्कृष्ट शिष्ट संस्कृति,
सभ्यता समाज में ।
जागरण आवश्यक
सीमान्त जन-वर्ग का ।
समस्त समुदाय को
शिक्षित सुसंगठित कर,
संकीर्णताओं से —
तुच्छ निहित स्वार्थों से —
पूर्णतया मुक्त कर
लाना है श्रेष्ठ राज,
श्रेष्ठ अनुशासन–
सुशासन-प्रशासन जहाँ
सभी जन निर्भय हों,
सभी जन निर्भय हों,
हो समान,
होवें स्वकर्म-निरत,
विरत अधर्म से;
देश-माता के लिए
स्वजीवन-अर्पणकर्ता,
कर्मठ-कुशल-शिल्पी,
विद्वान, मानवता-पोषक,
त्यागी-निरोग-योग्य ।
विकसित हों जिससे
वाणिज्य-उद्योग कई,
धंधे अनेक अन्य,
किन्तु दृष्टि उनकी हो
लोकोपकार पर–
मानव उत्कर्ष पर ।

दुर्जन के सम्मुख
सिर झुका लेने से
बंद नहीं करता वह
अत्याचार-दुराचार ।
जब तक उसका न होगा प्रतिकार–
डटकर भरी विरोध,
शांति नहीं हो सकती ।
अत्याचार का सामना
साहसपूर्वक
करना होगा निश्चय
यही है वर्तमान धर्म
देश-धर्म
समाज-धर्म
यही है व्यक्ति-धर्म
मानवता, श्रेय, प्रेय ।
नारी अरक्षित यदि
जीवन ही व्यर्थ है ।
नारी के शोषण में
कोई नहीं पीछे
देव-दानव-मानव-राक्षस
सबने किया उस पर
असहनीय अत्याचार
बनाया सभी ने उसे
भोग्या – विलास-वस्तु
सुरा-सहयोगिनी सुन्दरी मदालसा,
उर्वशी, धृताची, रंभा, मेनका,
तिलोत्तमा, सहजन्या,
विप्रचित्ति आदि-आदि ।
नारी क्या है केवल भोग-वस्तु ?
केवल रूपाजीवा ?
नहीं वह माँ है
बहन, बेटी, भार्या ?
घृण्य, यह परम घृण्य
भोगवृत्ति का विचार
यह रीति-नीति
यह परम्परा सुदीर्घ,
एकदम असंगत है ,
कलंक सभ्यता के नाम ।
धिक् धिक् परदारारत्यर्थी !
धिक् धिक् कामवासना अदम्य !
नारी ! निमित्त बनो
तुम्हीं युग परिवर्तन का ।
नारी ! ओ नारी !
पुरुष की आत्मा !
पति की सम्पूर्णता
तुम में निहित है,
ओ जननी, जाया, दयिता, भार्या !
ओ प्रभामय प्रातः प्रत्यूषा !
किरण ओ रक्तक्षीरा !
तुम्हीं बनो निमित्त
युग-परिवर्तन का ।
याद है मुझे अभी तक
अभिशप्ता पति-त्यक्ता
ऋषिपत्नी पतिव्रता
अहल्या का म्लान मुख
चिर तिरस्कार दग्ध ।
नहीं, अब और नहीं
बनने दूँगा मैं
अह्ल्याएँ — अरजाएँ
आर्यों के देश में,
होंगी अब ललनाएँ भीति-मुक्त
निःशंक विचरण करेगीं वे
यत्र-तत्र-सर्वत्र ।
कराना होगा नारी को
उसकी महानता का बोध,
जगाना होगा उसका आत्मबल,
आत्म-विश्वास;
बदलना होगा पुरुष को
स्वभाव, अपना ह्रदय,
अपना दृष्टिकोण ।
नारी के प्रति,
न्य मानव बन
पुनर्जन्म लेना होगा ।
सीता का अपमान
अपमान नारी जाति का है ,
अपमान रघुवंश का,
अपमान स्वयं राम का है ।
लहलहाती केसर की क्यारी-सी सीता की
देहयष्टि–अंग-कांति
मेरे अतिरिक्त कोई
अन्य स्पर्श करे,
संभव नहीं है
यह संभव नहीं है ।
सीता मेरी परिणीता
उस पर कुदृष्टि
वह भी मेरी उपस्थिति में –
धनुर्धर दाशरथि राम की उपस्थिति में ?
पिताश्री की मृत्यु भी
उतना दुखदायी नहीं,
नहीं यह वनवास,
राज्य-सत्ता से च्युत होना,
जितना स्वर्गंगा-सी तन्वंगी सीता का
क्षत-विक्षत होना ।
इसे नहीं सह सकता,
सहना नपुंसकता है
ऐसे स्थानों पर पापपूर्ण कायरता है ।
स्वयं आरोपित मेरा यह निर्वासन,
मेरा जीवन-दर्शन,
मेरा उर्जस्वित विश्वास,
मेरा अपराजेय पौरुष
तोड़कर रख देगा
शिलाभूत कायरता;
कामुकता काई-सी फैली, फट जाएगी,
गुनगुनी उदासी
वंध्या है, वंध्या है ।

उठो राम, उठो राम
नूतन संकल्प ले
स्थापित करो फिर से
नूतन जीवन-मूल्य,
नूतन विचार-दृष्टि,
नूतन व्यवस्था,
नूतन आदर्श
नूतन राज
रामराज रामराज रामराज
रा…म…रा…ज………. ।

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