घोसला मै अंडा तजि उडत अकासचारी-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

घोसला मै अंडा तजि उडत अकासचारी-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

 

घोसला मै अंडा तजि उडत अकासचारी
संध्या समै अंडा होति चेति फिरि आवयी ।
तिरिया त्याग सुत जात बन खंड बिखै
सुत की सुरति ग्रेह आइ सुक पावयी ।
जैसे जल कुंड करि छाडियत जलचरी
जब चाहे तब गह लेत मनि भावयी ।
तैसे चित चंचल भ्रमत है चतुरकुंट
सतिगुर बोहथ बेहंग ठहरावयी ॥१८४॥

Leave a Reply