गढ़े अविद्या ने रचे, हाथी डूब अनंत-ज्ञान-वैराग्य कुण्डलियाँ-गिरिधर कविराय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Giridhar Kavirai

गढ़े अविद्या ने रचे, हाथी डूब अनंत-ज्ञान-वैराग्य कुण्डलियाँ-गिरिधर कविराय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Giridhar Kavirai

गढ़े अविद्या ने रचे, हाथी डूब अनंत ।
जोइ गिर्यो तिस खांत में, धंसग्यो कानप्रयंत ॥
धंसग्यो कानप्रयंत, आपको सुनै न देखै।
बहरो अंधरो भयो, दशो दिशि तम इक पेखै ॥
कह गिरिधर कविराय, यदपि शास्त्र स्मृति पढ़ै ।
तिसीतिसी में मगन गिर्यो है जिस-जिस गढ़ै॥

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