ग्राम्या -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 2

ग्राम्या -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 2

रेखा चित्र

चाँदी की चौड़ी रेती,
फिर स्वर्णिम गंगा धारा,
जिसके निश्चल उर पर विजड़ित
रत्न छाय नभ सारा!

फिर बालू का नासा
लंबा ग्राह तुंड सा फैला,
छितरी जल रेखा-
कछार फिर गया दूर तक मैला!

जिस पर मछुओं की मँड़ई,
औ’ तरबूज़ों के ऊपर,
बीच बीच में, सरपत के मूँठे
खग-से खोले पर!

पीछे, चित्रित विटप पाँति
लहराई सांध्य क्षितिज पर,
जिससे सट कर
नील धूम्र रेखा ज्यों खिंची समांतर।

बर्ह पुच्छ-से जलद पंख
अंबर में बिखरे सुंदर
रंग रंग की हलकी गहरी
छायाएँ छिटका कर।

सब से ऊपर निर्जन नभ में
अपलक संध्या तारा,
नीरव औ’ निःसंग,
खोजता सा कुछ, चिर पथहारा!

साँझ,- नदी का सूना तट,
मिलता है नहीं किनारा,
खोज रहा एकाकी जीवन
साथी, स्नेह सहारा!

(जनवरी’ ४०)

दिवा स्वप्न

दिन की इस विस्तृत आभा में, खुली नाव पर,
आर पार के दृश्य लग रहे साधारणतर।
केवल नील फलक सा नभ, सैकत रजतोज्वल,
और तरल विल्लौर वेश्मतल सा गंगा जल-
चपल पवन के पदाचार से अहरह स्पंदित-
शांत हास्य से अंतर को करते आह्लादित।
मुक्त स्निग्ध उल्लास उमड़ जल हिलकोरों पर
नृत्य कर रहा, टकरा पुलकित तट छोरों पर।

यह सैकत तट पिघल पिघल यदि बन जाता जल
बह सकती यदि धरा चूमती हुई दिगंचल,
यदि न डुबाता जल, रह कर चिर मृदुल तरलतर,
तो मै नाव छोड़, गंगा के गलित स्फटिक पर
आज लोटता, ज्योति जड़ित लहरों सँग जी भर!
किरणों से खेलता मिचौंनी मैं लुक छिप कर,
लहरों के अंचल में फेन पिरोता सुंदर,
हँसता कल कल: मत्त नाचता, झूल पैंग भर!

कैसा सुंदर होता, वदन न होता गीला,
लिपटा रहता सलिल रेशमी पट सा ढीला!
यह जल गीला नहीं, गलित नभ केवल चंचल,
गीला लगता हमें, न भीगा हुआ स्वयं जल।
हाँ, चित्रित-से लगते तृण-तरु भू पर बिम्बित,
मेरे चल पद चूम धरणि हो उठती कंपित।

एक सूर्य होता नभ में, सौ भू पर विजड़ित,
सिहर सिहर क्षिति मारुत को करती आलिंगित।
निशि में ताराओं से होती धरा जब खचित
स्वप्न देखता स्वर्ग लोक में मैं ज्योत्स्ना स्मित!

गुन के बल चल रही प्रतनु नौका चढ़ाव पर,
बदल रहे तट दृश्य चित्रपट पर ज्यों सुंदर।
वह, जल से सट कर उड़ते है चटुल पनेवा,
इन पंखो की परियों को चाहिए न खेवा!
दमक रही उजियारी छाती, करछौंहे पर,
श्याम घनों से झलक रही बिजली क्षण क्षण पर!
उधर कगारे पर अटका है पीपल तरुवर
लंबी, टेढ़ी जड़ें जटा सी छितरीं बाहर।
लोट रहा सामने सूस पनडुब्बी सा तिर,
पूँछ मार जल से चमकीली, करवट खा फिर।

सोन कोक के जोड़े बालू की चाँदो पर
चोंचों से सहला पर, क्रीड़ा करते सुखकर।
बैठ न पातीं, चक्कर देतीं देव दिलाई,
तिरती लहरों पर सुफ़ेद काली परछाँई।
लो, मछरंगा उतर तीर सा नीचे क्षण में,
पकड़ तड़पती मछली को, उड़ गया गगन में।
नरकुल सी चोंचें ले चाहा फिरते फर्‌ फर्‌।
मँडराते सुरख़ाब व्योम में, आर्त नाद कर,-
काले, पीले, खैरे, बहुरंगे चित्रित पर
चमक रहे बारी बारी स्मित आभा से भर!

वह, टीले के ऊपर, तूँबी सा, बबूल पर,
सरपत का घोंसला बया का लटका सुंदर!
दूर उधर, जंगल में भीटा एक मनोहर
दिखलाई देता है वन-देवों का सा घर।
जहाँ खेलते छायातप, मारुत तरु-मर्मर,
स्वप्न देखती विजन शांति में मौन दोपहर!
वन की परियाँ धूपछाँह की साड़ी पहने
जहाँ विचरतीं चुनने ऋतु कुसुमों के गहने।

वहाँ मत्त करती मन नव मुकुलों की सौरभ,
गुंजित रहता सतत द्रुमों का हरित श्वसित नभ!
वहाँ गिलहरी दौड़ा करती तरु डालों पर
चंचल लहरी सी, मृदु रोमिल पूँछ उठा कर।
और वन्य विहगों-कीटों के सौ सौ प्रिय स्वर
गीत वाद्य से बहलाते शोकाकुल अंतर।

वहीं कहीं, जी करता, मैं जाकर छिप जाऊँ,
मानव जग के क्रंदन से छुटकारा पाऊँ।
प्रकृति नीड़ मे व्योम खगों के गाने गाऊँ,
अपने चिर स्नेहातुर उर की व्यथा भुलाऊँ!

(जनवरी’ ४०)

सौन्दर्य कला

नव वसंत की रूप राशि का ऋतु उत्सव यह उपवन,
सोच रहा हूँ, जन जग से क्या सचमुच लगता शोभन!
या यह केवल प्रतिक्रिया, जो वर्गों के संस्कृत जन
मन में जागृत करते, कुसुमित अंग, कंटकावृत मन!

रंग रंग के खिले फ़्लॉक्स, वरवीना, छपे डियांथस,
नत दृग ऐटिह्रिनम, तितली सी पेंज़ी, पॉपी सालस;
हँसमुख कैंडीटफ्ट, रेशमी चटकीले नैशटरशम,
खिली स्वीट पी,- – एवंडंस, फ़िल वास्केट औ’ ब्लू बैंटम।
दुहरे कार्नेशंस, स्वीट सुलतान सहज रोमांचित,
ऊँचे हाली हॉक, लार्कस्पर पुष्प स्तंभ से शोभित।

फूले बहु मख़मली, रेशमी, मृदुल गुलाबों के दल,
धवल मिसेज एंड्रू कार्नेगी, ब्रिटिश क्वीन हिम उज्वल।
जोसेफ़ हिल, सनबर्स्ट पीत, स्वर्णिम लेडी हेलिंडन,
ग्रेंड मुगल, रिचमंड, विकच ब्लैक प्रिंस नील लोहित तन।
फ़ेअरी क्वीन, मार्गेरेट मृदु वीलियम शीन चिर पाटल,
बटन रोज़ बहु लाल, ताम्र, माखनी रंग के कोमल।

विविध आयताकार, वर्ग षट्कोण क्यारियाँ सुषमित,
वर्तुल, अंडाकृति, नव रुचि से कटी छँटी, दूर्वावृत।
चित्रित-से उपवन में शत रंगो में आतप-छाया,
सुरभि श्वसित मारुत, पुलकित कुसुमों की कंपित काया।
नव वसंत की श्री शोभा का दर्पण सा यह उपवन,
सोच रहा हूँ, क्या विवर्ण जन जग से लगता शोभन!

इस मटमैली पृथ्वी ने सतरंगी रवि किरणों से
खींच लिए किस माया बल से सब रँग आभरणों से।
युग युग से किन सूक्ष्म बीज कोषों से विकसित होकर
राशि राशि ये रूप रंग भू पर हो रहे निछावर!
जीवन ये भर सके नहीं मृन्मय तन में धरती के,
सुंदरता के सब प्रयोग लग रहे प्रकृति के फीके!

जग विकास क्रम में सुंदरता कब की हुई पराजित,
तितली, पक्षी, पुष्प वर्ग इसके प्रमाण हैं जीवित।
हृदय नहीं इस सुंदरता के, भावोन्मेष न मन में,
अंगों का उल्लास न चिर रहता, कुम्हलाता क्षण में!
हुआ सृष्टि में बुद्ध हॄदय जीवों का तभी पदार्पण,
जड़ सुंदरता को निसर्ग कर सका न आत्म समर्पण,
मानव उर में भर ममत्व जीवों के जीवन के प्रति
चिर विकास प्रिय प्रकृति देखती तब से मानव परिणति।

आज मानवी संस्कृतियाँ हैं वर्ग चयन से पीड़ित,
पुष्प पक्षियों सी वे अपने ही विकास में सीमित।
इस विशाल जन जीवन के जग से हो जाति विभाजित
व्यापक मनुष्यत्व से वे सब आज हो रहीं वंचित!
हृदय हीन, अस्तित्व मुग्ध ये वर्गों के जन निश्चित,
वेश वसन भूषित बहु पुष्प-वनस्पतियों से शोभित!
हुआ कभी सौन्दर्य कला युग अंत प्रकृति जीवन में,
मानव जग से जाने को वह अब युग परिवर्तन में।

हृदय, प्रेम के पूर्ण हृदय से निखिल प्रकृति जग शासित,
जीव प्रेम के सन्मुख रे जीवन सौन्दर्य पराजित!
नव वसंत की वर्ग कला का दर्शन गृह यह उपवन,
सोच रहा हूँ विश्री जन जग से लगता क्या शोभन!

(फ़रवरी’ ४०)

स्वीट पी के प्रति

कुल वधुओं सी अयि सलज्ज, सुकुमार!
शयन कक्ष, दर्शन गृह की श्रृंगार!
उपवन के यत्नों से पोषित.
पुष्प पात्र में शोभित, रक्षित,
कुम्हलाती जाती हो तुम, निज शोभा ही के भार!
कुल वधुओं सी अयि सलज्ज, सुकुमार!

सुभग रेशमी वसन तुम्हारे
सुरँग, सुरुचिमय,-
अपलक रहते लोचन!
फूट फूट अंगों से सारे
सौरभ अतिशय
पुलकित कर देती मन!
उन्नत वर्ग वृंत पर निर्भर,
तुम संस्कृत हो, सहज सुघर,
औ’ निश्चय वानस्पत्य चयन में
दोनों निर्विशेष हो सुंदर!
निबल शिराओं में, मृदु तन में
बहती युग युग से जीवन के सूक्ष्म रुधिर की धार!
कुल वधुओं सी अयि सलज्ज, सुकुमार!

मृदुल मलय के स्नेह स्पर्श से
होता तन में कंपन,
जीवन के ऐश्वर्य हर्ष से
करता उर नित नर्तन,-
केवल हास विलास मयी तुम
शोभा ही में शोभन,
प्रणय कुंज में साँझ प्रात
करती हो गोपन कूजन!
जग से चिर अज्ञात,
तुम्हें बाँधे निकुंज गृह द्वार!
कुल वधुओं सी अयि सलज्ज, सुकुमार!

हाय, न क्या आंदोलित होता
हृदय तुम्हारा
सुन जगती का क्रंदन?
क्षुधित व्यथित मानव रोता
जीवन पथ हारा
सह दुःसह उत्पीड़न !
छोड़ स्वर्ण पिंजर
न निकल आओगी बाहर
खोल वंश अवगुंठन?
युग युग से दुख कातर
द्वार खड़े नारी नर
देते तुम्हें निमंत्रण!
जग प्रांगण में क्या न करोगी तुम जन हित अभिसार?
कुल वधुओं सी अयि सलज्ज, सुकुमार !

क्या न बिछाओगी जन पथ पर
स्नेह सुरभि मय
पलक पँखड़ियो के दल?
स्निग्ध दृष्टि से जन मन हर
आँचल से ढँक दोगी न शूल चय? जर्जर मानव पदतल!
क्या न करोगी जन स्वागत
सस्मित मुख से?
होने को आज युगान्तर!
शोषित दलित हो रहे जाग्रत,
उनके सुख से
समुच्छ्वसित क्या नहीं तुम्हारा अंतर?
क्या न, विजय से फूल, बनोगी तुम जन उर का हार?
कुल वधुओं सी अयि सलज्ज, सुकुमार!

हाय, नहीं करुणा ममता है मन में कहीं तुम्हारे!
तुम्हें बुलाते
रोते गाते
युग युग से जन हारे!
ऊँची डाली से तुम क्षण भर
नहीं उतर सकती जन भू पर!
फूली रहती
भूली रहती
शोभा ही के मारे!
केवल हास विलास मयी तुम!
केवल मनोभिलाष मयी तुम!
विभव भोग उल्लास मयी तुम!
तुमको अपनाने के सारे
व्यर्थ प्रयत्न हमारे!
बधिरा तुम निष्ठुरा,-
जनों की विफल सकल मनुहार!
कुल वधुओं सी अयि सलज्ज सुकुमार!

(फ़रवरी’ ४०)

Leave a Reply