ग्यांन लीला-भक्त रामानन्द जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Ramanand Ji

ग्यांन लीला-भक्त रामानन्द जी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhakt Ramanand Ji

मूरष तन धर कहा कमायौ ।
रांम भजन बिन जन्म गमायौ ॥
रांम भगति गत जांणी नाहीं ।
भन्दू भूलौ धंधा माहीं ॥१॥

मेरी मेरी करतो फिरियौ ।
हरि सुमिरण तो कबू न करियौ ॥
नारी सेती नेह लगायौ ।
कबहूं हिरदै रांम नहिं आयौ ॥२॥

सुष माया सूं षरो पियारो ।
कबहुं न सिवरयौ सिरजनहारो ॥
स्वारथ माहिं चहूं दिसि धायौ ।
गोबिन्द को गुंण कबहुं न गायौ ॥३॥

ऐसे ऐसे करत बुहारा ।
आये साहिब के हलकारा ॥
बंधे काल कीयौ चौरंगा ।
सुत बेटी नार कोइ नहि संगा ॥४॥

जो तुम करम कीया है भारी ।
सो अब संग सु चलै तुमारी ॥
जम आगै लै ठाढो कीनो ।
धरम राय बूझण कू लीनो ॥५॥

जिण पांणीं सू पैदा कीयौ ।
नर सौ रूप तोहि कूं दीयौ ॥६॥

जो तूं बिसरयौ मूरष अंधा ।
तो तूं आयौ जंम पै बंधा ॥७॥

हरि की कथा सुनी नहीं कानां ।
तो तू नांहीं जम सूं छांनां ॥
साध कै संगत मैं कछू न रहियौ ।
मुष सूं रांम कछु नहिं कहियौ ॥८॥

हरि की भगति करौ नर नारी ।
धरम राय यूं कहै बिचारी॥
मोकूं दोस न दीजै कोई।
जिसा करम भुगताऊँ सोई ॥९॥

पाप पुंन कूं न्यारा छांणूं ।
जो तुम करम करो सो जांणूं॥
तुमरा करम तुमै भुगताऊँ ।
आद पुरुस की आग्यां पाऊँ ॥१०॥

साहिब की अग्यां है मोकूं ।
महा कसौटी देहूं तोकूं ॥
घड़ी घड़ी का लेषा लेहूं ।
करमादिक तेरा भर देहूं ॥११॥

है हरि बिनां कूंण रषवारो ।
चित दे सिवरौ सिरजणहारो ॥
संकट मैं हरि बेह उबारी ।
निस दिन सिमरौ नांम मुरारी ॥१२॥

नांम निकेवल सबते न्यारा ।
रटत अघट घट होय उजारा ॥
रामानंद यूं कहै समुझाई ।
हरि सिमरयौ जम लोक न जाई ॥१३॥

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