गोपी-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar 

गोपी-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

 

गोपी

राधा का प्रणाम मुझसे लो,
श्याम-सखे, तुम ज्ञानी;
ज्ञान भूल, बन बैठा उसका
रोम-रोम ध्रुव-ध्यानी ।

न तो आज कुछ कहती है वह
और न कुछ सुनती है;
अन्तर्यामी ही यह जानें,
क्या गुनती-बुनती है।

कर सकती तो करती तुमसे
प्रश्न आप वह ऐसे-
“सखे, लौट आये गोकुल से?
कहो, राधिका कैसे?”

राधा हरि बन गयी हाय! यदि
हरि राधा बन पाते,
तो उद्धव, मधु वन से उलटे
तुम मधुपुर ही जाते।

अभी विलोक एक अलि उड़ता,
उसने चौंक कहा था-
“सखि, वह आया, इस कलिका में
क्या कुछ शेष रहा था?”

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