गैरिक वाणी-सात गीत-वर्ष -धर्मवीर भारती-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati

गैरिक वाणी-सात गीत-वर्ष -धर्मवीर भारती-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dharamvir Bharati

मेरी वाणी
गैरिक-वसना
भूल गयी गोरे अंगों को
फूलों के वसनों में कसना
गैरिक-वसना
मेरी वाणी !

अब विरागिनी
मेरा निज दुख, मेरा निज सुख
दोनों से तटस्थ रागिनी
अब विरागिनी
मेरी वाणी !

चन्दन-शीतल,
पीड़ा से परिशोधित स्वर में
उभरा एक नवीन धरातल
चन्दन-शीतल
मेरी वाणी !

भटके हुए व्यक्ति का संशय
इतिहासों का अन्धा निश्चय
ये दोनों जिसमें पा आश्रय
बन जायेंगे सार्थक समतल

ऐसे किसी अनागत पथ का
पावन माध्यम-भर है
मेरी आकुल प्रतिभा,
अर्पित रसना
गैरिक-वसना
मेरी वाणी !

जल-सी निर्मल
मणि-सी उज्जवल
नवल, स्नात
हिम धवल
ऋजु
तरल
मेरी वाणी !

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