गूँजेगी आवाज़-क्योंकि मैं उसे जानता हूँ अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

गूँजेगी आवाज़-क्योंकि मैं उसे जानता हूँ अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

गूँजेगी आवाज़
पर सुनाई नहीं देगी।

हाथ उठेंगे, टटोलेंगे,
पर पकड़ाई नहीं पावेंगे।

लहकेगी आग, आग, आग
पर दिखाई नहीं देगी।

जल जाएँगे नगर, समाज, सरकारें,
अरमान, कृतित्व, आकांक्षाएँ:
नहीं मरेगा, विश्वास:
छूट जाएँगी रासें, पतवारें, कुंजियाँ, हत्थे,
नहीं निकलेगी गले की फाँस।

टूट जाएगी मानवता
नहीं चुकेगी कमबख्त मानव की साँस-
धौंकनी जो सुलगाती रहेगी
दबी हुई चिनगारियाँ।

घुटन और धुएँ को
कँपाएगी लहर:
गूँजेगी आवाज़
पर सुनाई नहीं देगी…

नयी दिल्ली, 28 सितम्बर, 1968

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