गूँगे- ऐसा कोई घर आपने देखा है अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

गूँगे- ऐसा कोई घर आपने देखा है अज्ञेय- सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन “अज्ञेय”-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya,

(निकिता स्तानेस्कू की स्मृति में)
सभी तो गूँगे हैं, पर एक
निकलता है जो अपने गूँगेपन को पहचानता है
उसका दर्द बोलता है और उस में
सब अपनी वाणी पहचानते हैं।
वह अपने दर्द पर हँसता है।
हम सहम जाते हैं कि कहीं वह हँसी भी
हमारी पहचानी हुई तो नहीं है?
पहचान से सहमना-
सहमने की पहचान से झिझकना
हमारा गूँगापन है
नहीं तो हम
उसकी हँसी से क्यों सहमते?

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