गुमनाम है…-ज़हीर अली सिद्दीक़ी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Zahir Ali Siddiqui

गुमनाम है…-ज़हीर अली सिद्दीक़ी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Zahir Ali Siddiqui

 

सभ्यता के मार्ग में
विलुप्त कितने हो गए
शिष्टता तो आज भी
अदृश्य होकर रह गयी।।

दूर जाता मनू भी
अनुरोध करता रह गया
सभ्यता और सभ्य का
मिलाप होना रह गया।।

इंसानियत की राह से
इंसान ही भटका हुआ
शूल के अंबार में भी
गुस्ताखियाँ इन्सान की।।

क्या करोगे रोशनी
रोशन जहाँ है आज भी
नेत्र तुमने बन्द की है
खोलकर देखो जरा।।

राहों से पत्थर हटा
रास्ता खुल जायेगा
सुनसान राहें आज भी
क्यों हुई गुमनाम हैं?

विभावरी तू अदृश्य है
क्यों वासर अंतर्ध्यान है?
प्रभा से विपुल मानव,
क्यों तमिस्रा का प्रवाह है?

 

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