गीत गुंज (कुंज)-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 2

गीत गुंज (कुंज)-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 2

जिधर देखिये, श्याम विराजे

जिधर देखिये, श्याम विराजे ।
श्याम कुंज वन, यमुना श्यामा,
श्याम गगन, घन-वारिद गाजे ।

श्याम धरा, तृषा-गुल्म श्याम हैं
श्याम सुरभि-अंचल दल साजे;
श्याम बलाका, शालि श्याम हैं,
श्याम-विजय-बाजे नभ बाजे ।

श्याम मयूर, कोकिला श्यामा,
कूजन, नृत्य श्याम मृदु माजे;
श्याम काम, रवि श्याम मध्य दिन,
श्याम नयन काजल के आंजे ।

श्रुति के अक्षर श्याम देखिये,
दीप-शिखा पर श्याम निवाजे;
श्याम तामरस, श्याम सरोवर
श्याम अनिल, छवि श्याम संवाजे ।

पारस, मदन हिलोर न दे तन

पारस, मदन हिलोर न दे तन,
बरसे झूम झूम कर सावन ।

बन द्रुमराजि साज सब साजे,
बसन हरे उर उड़े, विराजे,
अलियों, जूही की कलियों की
मधु की गलियों नूपुर बाजे;
घर बिछड़े आये मन-भावन ।

केश के मेचक मेघ छुटे

केश के मेचक मेघ छुटे
पलक-पल्लव पगतलों लुटे ।

सुख की इतराई आंखों में,
लगे फूल जैसे शाखों में,
मंडलाई सुगंध से नभ-
रंभा के रंग उठे ।

खिंची खसी साड़ी की मुख छवि,
कभी नहीं जो दिखा उगा रवि,
गदगद नद की भंवर-भंवर में,
दु:ख के पौर टुटे ।

धिक मनस्सब, मान, गरजे बदरवा

धिक मनस्सब, मान, गरजे बदरवा ।
झूले झिले, गान सरजे बदरवा ।

चीर के धनुश के तीर छुटे, छटे,
बून्द के वारि के वसन बूटे बटे,
गले के चले गायन, चरायन पटे,
पेड़ के तल, अतल, लरजे बदरवा ।

घुसे कामद शिखर, शिखर-गिरि फैल कर,
घन प्रवहमान, वन, शैल से शैल पर;
गायन ध्वनित ग्राम-ग्राम से नगर-घर
नागरी-नागरी; बरजे बदरवा ।

बुझी दिल की न लगी मेरी

बुझी दिल की न लगी मेरी
तो क्‍या तेरी बात बनी।
चली कोई न चलायी चाल
तो क्‍या तेरी घात बनी।

भर दी करनी से बुरी जो,
तरी डगमग कर दी,
अपने पूरे बल पार
किनारे न जो तर दी।

बुझी दिल की न लगी मेरी
तो क्‍या तेरी बात बनी।

(रचनाकाल : 19 अप्रैल, 1953)

शाप तुम्हारा: गरज उठे सौ-सौ बादल

शाप तुम्हारा: गरज उठे सौ-सौ बादल;
ताप न वारा, काँपे पृथ्वी के तरुदल।

हर – हर हरती समीर,
जीवन – यौवन अधीर,
चले तीक्ष्ण – तीक्ष्ण तीर,
छूटे गृह – वन के सम्बल।

नीचे – ऊपर अपार
सलिल राशि विसम्भार,
मुहर्मुह: वज्रहार,
संसृति के संहत चञ्चल।

आओ अनिमेष नयन,
करो निरामय वर्षण,
सञ्चय हे संघर्षण !
कलित साधना के शुभफल।

(रचनाकाल : 8 जनवरी, 1954)

फेर दी आँख जी आया

फेर दी आँख जी आया
जैसे रसाल बौराया।

रहकर मेरे दबते मन
फूटे सौ – सौ मधु गुञ्जन,
तन की छवियाँ नत लोचन,
उमड़ी, मानस लहराया।

सूखी समीर नव – गन्धित,
बह चली छन्द से नन्दित,
उग आया सलिल कमल सित,
कोमल सुगन्ध नभ छाया !

(रचनाकाल : 5 फरवरी, 1954)

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