गिला-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

गिला-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

उस शोख के सितम का गिला आह क्या करूँ।
तन सूख कर हुआ है मेरा काह क्या करूँ॥
बहते हैं अश्क शामो सहर गाह क्या करूँ।
मिलता नहीं है तो भी वह गुमराह क्या करूँ॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

जिस दिन से उस से आन के फूटा मेरा नसीब।
दिल भर के एक दिन न हुआ देखना नसीब॥
हूँ जागता मैं तो भी नहीं जागता नसीब।
किन सख्तियों में आन पड़ा अब मैं या नसीब॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

इधर तो मुझको कत्ल करे है वह नेक नाम।
उधर को आ रहे हैं अजल के मुझे पयाम॥
अब यार को मनाऊँ कि रखूँ अजल को थाम।
इस कशमकश में अब कहो क्या-क्या करूँ मैं काम॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

गर यार की खु़शी न करूँ तो वह हो ख़फा।
और जो अजल को रोकूँ तो माने है वह बुरा॥
अर्सा था ज़िन्दगी का तो सौ घड़ियों पे आ लगा।
इस दो घड़ी में आह में क्या-क्या करूँ भला॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

गर अपनी ज़िन्दगानी का करता हूँ मैं हिसाब।
पल करने की देर है पानी का ज्यों हुबाब॥
क्यों कर बहे ना ग़म से मेरे आँसुओं का आब।
इतनी सी ज़िन्दगी में भी क्या क्या सहूँ अजाब॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

जो जी छुपा के अब न सहूँ यार की जफा।
तो आशिकों के बीच कहाता हूँ बेवफा॥
और जी को देखता हूँ तो एक दिन की है हवा।
इन मुश्किलों के बीच करूँ आह अब मैं क्या॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

गर हाथ धो के बैठ रहूं अब मैं सब्र कर।
तो लोग ताने देते हैं हँस-हँस के घर व घर॥
और यार से कहूँ तो वह करता नहीं नज़र।
इस बेबसी में आह कहां पीटूँ अपना सर॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

न आह का मकाँ है न रोने की अब है जाये॥
ने दिल को मेरे सब्र ना दिलदार मुँह लगाये
गर एक ग़म पुरे तो उसे जी मेरा उठाये।
इस आस्माँ फटे को कहूँ किससे अब मैं हाय॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

गर यार की गली में रहूँ जाके बेक़रार।
तो सख्तियों से मुझको उठाता है मार मार॥
हर आन तोड़ता है मेरी आस बार बार।
इस दर्दो ग़म को आह मैं किससे कहूँ पुकार॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

रोऊँ तो मुझको और रुलाता है वह हबीब।
बोलूँ तो यूँ कहे है कि चल मत निकाल जीव॥
गर उम्र देखता हूँ तो आ पहुँची अनकरीब।
और यार से सुलूक ये ठहरे है या नसीब॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

चाहूँ कि तुझको इश्क में अपने करूँ असीर।
तू दूर भागता है मुझे जान कर हक़ीर॥
ने मुझको कत्ल करता है ज़ालिम न दोस्तगीर।
क्या बे तरह के ग़म में फंसा हूँ मैं ऐ “नज़ीर”॥
फुर्सत तो साँस की भी नहीं आह! क्या करूँ।
क्या बेबसी है ऐ मेरे अल्लाह! क्या करूँ॥

Leave a Reply