गिरते उड़ते पत्ते-अमीरी रेखा_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

गिरते उड़ते पत्ते-अमीरी रेखा_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

इसमें अचरज और स्मृतियों का दोहराव है
कि दृश्य में अब सिर्फ पत्ते उड़ रहे हैं :
पीले, भूरे, सूखे, मद्धिम हरे

गिरते हए पत्ते किसी का इंतज़ार नहीं करते
हालाँकि हमें लगता है वे हमारी ही प्रतीक्षा में थे
और हमें देखते ही उन्होंने गिरना-उड़ना शुरू कर दिया है
वे उड़ रहे हैं जैसे बच्चे मैदान में, गलियों में, सड़कों पर दौड़ते-भागते हैं
गिरते-पड़ते, धकियाते, आगे निकलते, शोर करते, सीटी बजाते

सब तरफ़ उनके उड़ने का संगीत है
असीम दूरी तक उड़ते चले जाने
और पलटकर देखने की हार्दिकता है
इसमें पुनरावृत्ति है लेकिन सुंदरता और दुख
चरमराहट और उम्मीद है

वे नींद में गिरते हैं
और स्वप्नों को भरते हैं अपनी उड़ान से
उड़ते ही चले जाते हैं डाली से टूटे हुए पत्ते

कहीं अटका हुआ कोई पत्ता खड़खड़ाता है
पानी किनारे के पेड़ों के पत्ते
अपनी छाया के साथ एक सूखते हुए से आईने में गिरते हैं
और कई बार तो सिर्फ किसी गहराई में
अंधों की तरह गिरते हैं सड़क किनारों के पत्ते
घर किनारे के वृक्ष के पत्ते गिरते हैं घर के लोगों की तरह
छतों पर, आँगन में, सीढ़ियों पर, जब हम सो रहे होते हैं

जो गिरते उड़ते पत्तों को देखकर विकल नहीं होते
थम नहीं जाते
पत्ते उन्हें भी देखकर कुछ सोचते हुए से ठिठकते हैं
और फिर हवा उन्हें उड़ा ले जाती है।

 

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