गाते-गाते-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड दो-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar 

गाते-गाते-जलते हुए वन का वसन्त-खण्ड दो-दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

मैं एक भावुक-सा कवि
इस भीड़ में गाते-गाते चिल्लाने लगा हूँ ।

मेरी चेतना जड़ हो गई है—
उस ज़मीन की तरह-
वर्षा में परती रह जाने के कारण-
जिसने उपज नहीं दी
जिसमें हल नहीं लगे ।
यह देखते-देखते
कि कितने भयानक भ्रम में जिए हैं बीस वर्ष ।
यह सोचते-सोचते
कि मेरा कसूर क्या है
और क्या किया है इन लोगों ने
जो जीवन-भर सभाओं में तालियाँ बजाते रहे,
भूख की शिकायत नहीं की,
बड़ी श्रद्धा से-
थालों में सजे हुए भाषण
और प्रेस की कतरनें खाते रहे,
मेरा दिमाग भन्ना गया है !

मैं एक मामूली-सा कवि
इस ग़म में गाते-गाते चिल्लाने लगा हूँ।
नेताओ!
मुझे माफ़ करना
ज़रूर कुछ सुनहले स्वप्न होंगे-
जिन्हें मैंने नहीं देखा।
मैंने तो देखा
जो मशालें उठाकर चले थे
वे तिमिरजयी,
अंधेरे की कहानियाँ सुनाने में खो गए ।
सहारा टटोलते हुए दोनों दशक
ठोकरें खा-खाकर लंगड़े हो गए।
अपंग और अपाहिज बच्चों की तरह
नंगे बदन
ठण्ड में काँपता हुआ एक-एक वर्ष
ऐन मेरी पलकों के नीचे से गुज़रा है।
तुम्हारा आभारी हूँ रहनुमाओ !
तुम्हारी बदौलत मेरा देश, यातनाओं से नहीं,
फूलमालाओं से दबकर मरा है।

मैं एक मामूली-सा कवि
इस खुशी में गाते-गाते चिल्लाने लगा हूँ।

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