गाँधी-नीम के पत्ते -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

गाँधी-नीम के पत्ते -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

मा भै:, मा भै:, मा भै:, मा भै:।

मोह तिमिर है, मोह मृत्यु है;
छोड़ो इसे अभागो रे !
भय का बंधन तोड़ अमृत के
पुत्र मानवो ! जागो रे !
मा भै:, मा भै:, मा भै:, मा भै:।

दमन करो मत्त कभी, सत्य को
मुख से बाहर आने दो,
भय के भीषण अंधकार में
ज्योति उसे फैलाने दो ।
मा भै:, मा भै:, मा भै:, मा भै:।

जुल्मी को जुल्मी कहने में
जीभ जहाँ पर डरती है,
पौरुष होता क्षार वहाँ,
दम घोंट जवानी मरती है ।
मा भै:, मा भै:, मा भै:, मा भै:।

सत्य न होता प्राप्त कभी भी
सत्य-सत्य चिल्लाने से,
मिलता है वह सदा एक
निर्भयता को अपनाने से ।
मा भै:, मा भै:, मा भै:, मा भै:।

निर्भयता है ज्योति मनुज की,
निर्भयता मानव का बल,
निर्भयता शूरों की शोभा,
वीरों की करवाल प्रबल ।
मा भै:, मा भै:, मा भै:, मा भै:।

अभय, अभय ओ अमृतपुत्र
बेबसी, वेदना बोलो भी,
दम घुट रहा सत्य का भीतर,
द्वार ह्रदय का खोलो भी ।
मा भै:, मा भै:, मा भै:, मा भै:।
(1949)

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