गाँधी-आश्रम-प्यार पनघटों को दे दूंगा -शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

गाँधी-आश्रम-प्यार पनघटों को दे दूंगा -शंकर लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankar Lal Dwivedi

 

(एक सत्य घटना पर आधारित
जिसका अब कोई पात्र जीवित नहीं)

अल्हड़ यौवन की अलमस्ती,
उन्मुक्त उरोजों से बाहर।
आ कर आरक्त कपोलों पर;
फैलाती लज्जा की चादर।।

जर्जर, काली साड़ी में से-
यों दमक रहा था गोरा तन।
पूनम की खिली चाँदनी हो;
छितरे-छितरे हों श्यामल घन।।

पलकें पाटल की पँखुरी-सी,
लेकिन चिन्ता से बोझिल थीं।
बाँहें दो गोल-गोल जैसे-
कचनार बिरिछ की डंठल थीं।।

नंगे पाँवों मंथर-मंथर-
चलती, तो कटि बल खाती थी।
लगता था कोमल, कमल-नाल;
बस अब टूटी या तब टूटी।।

बिखरे कच भादों के पयोद,
भारी नितम्ब ज्यों भूधर थे-
हिलते मनोज के मनोभाव-
जगते पाहन के भीतर थे।।

रो दें तो मोती की लड़ियाँ,
यों डरें कि टूट बिखर जाएँ।
हँस दे तो उजड़े उपवन की-
डाली फूलों से भर जाएँ।।

ऐसी थी रूपा एक नज़र-
भर देखे, संयम हिल जाए।
लालायित था मन्मथ का मन,
रति रूठे, रूपा मिल जाए।।

आगे-पीछे कुछ इर्द-गिर्द,
शीटियाँ बज रहीं बेढंगी।
पौरुष के दम्भ, कुरूपे भी-
आवाज़ कस रहे थे गन्दी।।

रूपा को कुछ भी ध्यान नहीं,
अपने भविष्य में भूली सी।
वक्षस्थल से शिशु चिपटाए,
चल रही धरा पर झूली सी।।

गाँधी-आश्रम का तिमंज़िला,
छत पर थे दीन-बन्धु नागर।
रूपा को देखा, तैर गया,
नयनों में सुधियों का सागर।।

बेबस रूपा के बापू भी-
स्वातंत्र्य-लहर के झगड़े में।
‘खादी पहनो, भाई धारो-
विश्वास स्वदेशी कपड़े में’।।

कहते-कहते ही पकड़े थे-
गोरी चमड़ी की सत्ता ने।
मेरे ही साथ, मगर उनको-
फ़रमाया याद विधाता ने।।

मरते-मरते बेचारे की,
आँखें पानी भर लाईं थीं।
रूपा के लालन-पालन की,
मुझको सौगन्ध दिलाई थी।।

पर मैंने विकसित यौवन में,
ली खेल वासना की होली।
असुरा-मदिरा के रंग रंगी-
अबला मुँह से न कभी बोली।।

तब इसका भारी पाँव भाँप,
मैंने बदनामी के डर से।
रूपा को अपने साथ लिया;
कर दिया गमन, निशि में घर से।।

भीगी सन्ध्या वीराने में,
अलमस्त क्षुब्ध सोई बस्ती।
थी जहाँ ज़िन्दगी की क़ीमत,
मोरी की कीचड़-सी सस्ती।।

दो-चार फूँस की कुटियों में,
बेबस ग़रीब का वक्ष चीर।
टप्-टप् गिरता था फूँसों से,
निर्लज्ज-नीर, बहता-समीर।।

बूढ़े को जगा लिया मैंने,
बस रात-रात को शरण माँग।
गहरी निद्रा में देख चूर,
मैं अधम चला चुपचाप भाग।।

सपना टूटा, मालिक नागर,
सुखिया से बोला- ‘देख! ज़रा
वह जो भिखारिणी जाती है-
मुझ तक दे कर आवाज़ बुला’।।

वैसा ही हुआ, चली आई,
अबला भिक्षा की आशा से।
रो उठी नज़र मिलते ही पर;
झोली भर गई निराशा से।।

विद्रोह-घृणा के भाव स्वतः-
उग आए, आकुल अन्तर में।
‘तू नीच! अधम! कामी! पापी!
है और अभी किस चक्कर में’?

गीली पलकें ‘क्षमयस्व’ भाव-
लेकिन श्वासों में भरे कपट।
कुछ और कहे इससे पहले-
छू लिये पतित ने चरण झपट।।

नारीत्व पगा है करुणा में,
हिलकी भर कर रोया केवल।
‘राजू’ पर उमगा स्नेह देख,
गोवध-घर समझ लिया देवल।।

‘बैठो पहले मैं स्वयं तुम्हें-
हाथों से दूध पिलाऊँगा।
पीछे अपनी मजबूरी का,
तुमको विश्वास दिलाऊँगा’।।

सुन कर ‘सुखिया’ सब भाँप गई,
दूध में हलाहल पिला दिया।
हँस कर नागर ने रूपा को,
कन्धों से पकड़ा, हिला दिया।।

बोला, ‘दिन है, कुछ बात बने,
सन्ध्या हो, आ जाना रानी!
घर की शोभा! गृह-लक्ष्मी! तब,
मैं स्वयं करूँगा अगुवानी’।।

रूपा शरमाई मन ही मन,
तस्वीर बना कर दुलहिन की।
‘सन्ध्या तक अब परवाह नहीं,
हे नाथ! किसी भी उलझन की’।।

कोरे सपनों के फूल भरे-
आँचल में, बाहर आ बैठी।
फूटी गागर को भरी समझ,
नादान किसी पनिहारिन-सी।।

सन्ध्या होते-होते लेकिन,
काया ढेली सी बिखर गई।
दो-दो निरीह जब साथ चले,
मृत्यु भी एक पल सिहर गई।।

गंगा की लहरे काँप उठीं,
सागर का अन्तर डोल उठा।
दामिनी दमक कर यों बोली-
‘भर गई नीच! तेरी झोली’।।

पर धरती को धीरज न बँधा।
सहमा-सहमा कुछ रुँधा-रुँधा।
आकाश जम गया खोया सा,
कुछ सिसका सा, कुछ रोया सा।।

उपवन उदास था, कलियाँ भी,
चीत्कार कर उठीं गलियाँ भी।
थम गया ठिठुरता हुआ पवन,
मरघट करता था मौन-मनन।।

दीपक की बाती गुज़र गई,
शबनम घासों पर बिखर गई।
श्वानों ने- गा ‘मर्सिया’ राग,
अपने करतब की रखी लाज।।

दुःख देख-देख, तरु का कपोत-
गिर गया, मिली ज्योति में जोत।
सब ओर मातमी का मौसम,
हँसता तिमंज़िले पर खद्योत।।

आ पहुँचा, भीड़ चीर बोला-
‘गोवर्धन’ राजू को टटोल।
‘भैया राजू! तू आँख खोल,
तुतले-मीठे दो बोल, बोल!।।

नाराज़ न हो मेरे राजा!
मत कर पीड़ा का मन ताज़ा।
गलियों-गलियों की ख़ाक छान,
पा सका अधेला आज दान।।

बीरन! लाया हूँ- चने चबा,
हँस दे न कन्हैया! धीर बँधा।
तू क्या, मैं भी तो भूखा हूँ,
फिर भी किस-किस पर रूठा हूँ।।

अच्छा, मत बोल पराया हूँ,
यह भाव अभी तक भारी है।’
विष बुझे खड्ग सा प्रश्न लगा-
‘क्यों व्यर्थ तुझे लाचारी है?’

‘बाबू! मेरा इन से नाता-
तुम पूछ रहे हो? मत पूछो।
दोनों दो दिन से भूखे हैं,
यह माधो है, तो मैं ऊधो।।

व्यवहार-जगत के नाते तो,
सोने के ‘कंस’ निभाएँगे।
‘वसुदेव’ स्वप्न के शयन हेतु,
आँसू की सेज बिछाएँगे।।

नाते-रिश्ते तो उनके हैं,
यह प्रश्न उन्हीं को भाता है।
बिल्कुल विचित्र मेरा इनसे-
केवल ग़रीब का नाता है।।

जाओ दाता! क्यों काम हर्ज-
करते हो, व्यर्थ समय अपना।
अपना तो यही नियम-संयम,
कटुतम यथार्थ, मीठा सपना।।

सच तो यह है मैंने जब से,
जीने का होश सम्हाला है।
छोटे-छोटे गिन कर द्वादश-
दीपों का बुझा उजाला है।।

मैंने आँखों से देखा है,
कोई बीमार न हुआ कभी।
जैसे दीदी! राजू भैया-
वैसे ही भूखों मरे सभी।।

यों ही मेरे नन्हे-तुतले-
बचपन का हिया परवान हुआ।
सब हरा-भरा मेरा उपवन,
असमय में मूक मसान हुआ’।।

कह कर गोवर्धन फफक उठा,
गाँधी-आश्रम की चौखट पर।
जा कर माथा टेका अपना,
बिक जाने तक की नौबत पर।।

‘दो ग़ज़ खादी दे दो मालिक-
दीदी को कफ़न उढ़ाऊँगा।
अपने कंधों पर दो लाशें-
फिर मरघट में ले जाऊँगा’।।

‘खादी पैसे से मिलती है,
बाँचो यह ‘खादी-आश्रम’ है।
सबसे पहले! हाँ, ठीक पढ़ा-
सचमुच यह ‘गाँधी-आश्रम’ है।।
-21 दिसंबर, 1963

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