ग़म-ब-दिल, शुक्र-ब-लब, मस्तो-ग़ज़लख़्वाँ चलिए-शामे-श्हरे-यारां -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

ग़म-ब-दिल, शुक्र-ब-लब, मस्तो-ग़ज़लख़्वाँ चलिए-शामे-श्हरे-यारां -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

ग़म-ब-दिल, शुक्र-ब-लब, मस्तो-ग़ज़लख़्वाँ चलिए
जब तलक साथ तेरे उम्रे-गुरेज़ां चलिए

रहमते-हक से जो इस सम्त कभी राह निकले
सू-ए-जन्नत भी बराहे-रहे-जानां चलिए

नज़र मांगे जो गुलसितां से ख़ुदावन्दे-जहां
सागरो-ख़ुम में लिये ख़ूने-बहारां चलिए

जब सताने लगे बेरंगी-ए-दीवारे-जहां
नक़्श करने कोई तस्वीरे-हसीनां चलिए

कुछ भी हो आईना-ए-दिल को मुसफ़्फ़ा रखीए
जो भी ग़ुजरे, मिसले-खुसरवे-ए-दौरां चलिए

इमतहां जब भी हो मंज़ूर जिगरदारों का
महफ़िले-यार में हमराहे-रकीबां चलिए

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