ग़म बिकते हैं-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

ग़म बिकते हैं-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

ग़म बिकते हैं
बाजारों में
ग़म काफी महंगे बिकते हैं
लहजे की दूकान अगर चल जाये तो
जज्बे के गाहक
छोटे बड़े हर ग़म के खिलोने
मुंह मांगी कीमत पे खरीदें
मेने हमेशा अपने ग़म अच्छे दामों बेचे हैं
लेकिन
जो ग़म मुझको आज मिला है
किसी दुकां पर रखने के काबिल ही नहीं हैं
पहली बार में शर्मिन्दा हूँ
ये ग़म बेच नहीं पाऊंगा

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