ग़ज़ल -साहिर लुधियानवी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sahir Ludhianvi Part 4

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ग़ज़ल -साहिर लुधियानवी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sahir Ludhianvi Part 4

अक़ाएद वहम हैं मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी

अक़ाएद वहम हैं मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
अज़ल से ज़ेहन-ए-इंसाँ बस्ता-ए-औहाम है साक़ी

हक़ीक़त-आश्नाई अस्ल में गुम-कर्दा राही है
उरूस-ए-आगही परवुर्दा-ए-इब्हाम है साक़ी

मुबारक हो ज़ईफ़ी को ख़िरद की फ़लसफ़ा-रानी
जवानी बे-नियाज़-ए-इबरत-ए-अंजाम है साक़ी

हवस होगी असीर-ए-हल्क़ा-ए-नेक-ओ-बद-ए-आलम
मोहब्बत मावरा-ए-फ़िक्र-ए-नंग-ओ-नाम है साक़ी

अभी तक रास्ते के पेच-ओ-ख़म से दिल धड़कता है
मिरा ज़ौक़-ए-तलब शायद अभी तक ख़ाम है साक़ी

वहाँ भेजा गया हूँ चाक करने पर्दा-ए-शब को
जहाँ हर सुब्ह के दामन पे अक्स-ए-शाम है साक़ी

मिरे साग़र में मय है और तिरे हाथों में बरबत है
वतन की सर-ज़मीं में भूक से कोहराम है साक़ी

ज़माना बरसर-ए-पैकार है पुर-हौल शो’लों से
तिरे लब पर अभी तक नग़्मा-ए-ख़य्याम है साक़ी

जब कभी उन की तवज्जोह में कमी पाई गई

जब कभी उन की तवज्जोह में कमी पाई गई
अज़-सर-ए-नौ दास्तान-ए-शौक़ दोहराई गई

बिक गए जब तेरे लब फिर तुझ को क्या शिकवा अगर
ज़िंदगानी बादा ओ साग़र से बहलाई गई

ऐ ग़म-ए-दुनिया तुझे क्या इल्म तेरे वास्ते
किन बहानों से तबीअ’त राह पर लाई गई

हम करें तर्क-ए-वफ़ा अच्छा चलो यूँ ही सही
और अगर तर्क-ए-वफ़ा से भी न रुस्वाई गई

कैसे कैसे चश्म ओ आरिज़ गर्द-ए-ग़म से बुझ गए
कैसे कैसे पैकरों की शान-ए-ज़ेबाई गई

दिल की धड़कन में तवाज़ुन आ चला है ख़ैर हो
मेरी नज़रें बुझ गईं या तेरी रानाई गई

उन का ग़म उन का तसव्वुर उन के शिकवे अब कहाँ
अब तो ये बातें भी ऐ दिल हो गईं आई गई

जुरअत-ए-इंसाँ पे गो तादीब के पहरे रहे
फ़ितरत-ए-इंसाँ को कब ज़ंजीर पहनाई गई

अरसा-ए-हस्ती में अब तेशा-ज़नों का दौर है
रस्म-ए-चंगेज़ी उठी तौक़ीर-ए-दाराई गई

जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं

जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं
कैसे नादान हैं शो’लों को हवा देते हैं

हम से दीवाने कहीं तर्क-ए-वफ़ा करते हैं
जान जाए कि रहे बात निभा देते हैं

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं

तख़्त क्या चीज़ है और लाल-ओ-जवाहर क्या हैं
इश्क़ वाले तो ख़ुदाई भी लुटा देते हैं

हम ने दिल दे भी दिया अहद-ए-वफ़ा ले भी लिया
आप अब शौक़ से दे लें जो सज़ा देते हैं

जो लुत्फ़-ए-मय-कशी है निगारों में आएगा

जो लुत्फ़-ए-मय-कशी है निगारों में आएगा
या बा-शुऊर बादा-गुसारों में आएगा

वो जिस को ख़ल्वतों में भी आने से आर है
आने पे आएगा तो हज़ारों में आएगा

हम ने ख़िज़ाँ की फ़स्ल चमन से निकाल दी
हम को मगर पयाम बहारों में आएगा

इस दौर-ए-एहतियाज में जो लोग जी लिए
उन का भी नाम शोबदा-कारों में आएगा

जो शख़्स मर गया है वो मिलने कभी कभी
पिछले पहर के सर्द सितारों में आएगा

तरब-ज़ारों पे क्या बीती सनम-ख़ानों पे क्या गुज़री

तरब-ज़ारों पे क्या बीती सनम-ख़ानों पे क्या गुज़री
दिल-ए-ज़िंदा तिरे मरहूम अरमानों पे क्या गुज़री

ज़मीं ने ख़ून उगला आसमाँ ने आग बरसाई
जब इंसानों के दिल बदले तो इंसानों पे क्या गुज़री

हमें ये फ़िक्र उन की अंजुमन किस हाल में होगी
उन्हें ये ग़म कि उन से छुट के दीवानों पे क्या गुज़री

मिरा इल्हाद तो ख़ैर एक ला’नत था सो है अब तक
मगर इस आलम-ए-वहशत में ईमानों पे क्या गुज़री

ये मंज़र कौन सा मंज़र है पहचाना नहीं जाता
सियह-ख़ानों से कुछ पूछो शबिस्तानों पे क्या गुज़री

चलो वो कुफ़्र के घर से सलामत आ गए लेकिन
ख़ुदा की मुम्लिकत में सोख़्ता-जानों पे क्या गुज़री

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम

मायूसी-ए-मआल-ए-मोहब्बत न पूछिए
अपनों से पेश आए हैं बेगानगी से हम

लो आज हम ने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम

उभरेंगे एक बार अभी दिल के वलवले
गो दब गए हैं बार-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी से हम

गर ज़िंदगी में मिल गए फिर इत्तिफ़ाक़ से
पूछेंगे अपना हाल तिरी बेबसी से हम

अल्लाह-रे फ़रेब-ए-मशिय्यत कि आज तक
दुनिया के ज़ुल्म सहते रहे ख़ामुशी से हम

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से
चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से

ऐ रूह-ए-अस्र जाग कहाँ सो रही है तू
आवाज़ दे रहे हैं पयम्बर सलीब से

इस रेंगती हयात का कब तक उठाएँ बार
बीमार अब उलझने लगे हैं तबीब से

हर गाम पर है मजमा-ए-उश्शाक़ मुंतज़िर
मक़्तल की राह मिलती है कू-ए-हबीब से

इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ
जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से

कहने को दिल की बात जिन्हें ढूँढते थे हम
महफ़िल में आ गए हैं वो अपने नसीब से

नीलाम हो रहा था किसी नाज़नीं का प्यार
क़ीमत नहीं चुकाई गई इक ग़रीब से

तेरी वफ़ा की लाश पे ला मैं ही डाल दूँ
रेशम का ये कफ़न जो मिला है रक़ीब से

न तो ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए

न तो ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए
तिरा वजूद है अब सिर्फ़ दास्ताँ के लिए

पलट के सू-ए-चमन देखने से क्या होगा
वो शाख़ ही न रही जो थी आशियाँ के लिए

ग़रज़-परस्त जहाँ में वफ़ा तलाश न कर
ये शय बनी थी किसी दूसरे जहाँ के लिए

नफ़स के लोच में रम ही नहीं कुछ और भी है

नफ़स के लोच में रम ही नहीं कुछ और भी है
हयात साग़र-ए-सम ही नहीं कुछ और भी है

तिरी निगाह मिरे ग़म की पासदार सही
मिरी निगाह में ग़म ही नहीं कुछ और भी है

मिरी नदीम मोहब्बत की रिफ़अ’तों से न गिर
बुलंद बाम-ए-हरम ही नहीं कुछ और भी है

ये इज्तिनाब है अक्स-ए-शुऊर-ए-महबूबी
ये एहतियात-ए-सितम ही नहीं कुछ और भी है

इधर भी एक उचटती नज़र कि दुनिया में
फ़रोग़-ए-महफ़िल-ए-जम ही नहीं कुछ और भी है

नए जहान बसाए हैं फ़िक्र-ए-आदम ने
अब इस ज़मीं पे इरम ही नहीं कुछ और भी है

मिरे शुऊ’र को आवारा कर दिया जिस ने
वो मर्ग-ए-शादी-ओ-ग़म ही नहीं कुछ और भी है

मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी कभी

मिलती है ज़िंदगी में मोहब्बत कभी कभी
होती है दिलबरों की इनायत कभी कभी

शर्मा के मुँह न फेर नज़र के सवाल पर
लाती है ऐसे मोड़ पे क़िस्मत कभी कभी

खुलते नहीं हैं रोज़ दरीचे बहार के
आती है जान-ए-मन ये क़यामत कभी कभी

तन्हा न कट सकेंगे जवानी के रास्ते
पेश आएगी किसी की ज़रूरत कभी कभी

फिर खो न जाएँ हम कहीं दुनिया की भीड़ में
मिलती है पास आने की मोहलत कभी कभी

मैं ज़िंदा हूँ ये मुश्तहर कीजिए

मैं ज़िंदा हूँ ये मुश्तहर कीजिए
मिरे क़ातिलों को ख़बर कीजिए

ज़मीं सख़्त है आसमाँ दूर है
बसर हो सके तो बसर कीजिए

सितम के बहुत से हैं रद्द-ए-अमल
ज़रूरी नहीं चश्म तर कीजिए

वही ज़ुल्म बार-ए-दिगर है तो फिर
वही जुर्म बार-ए-दिगर कीजिए

क़फ़स तोड़ना बाद की बात है
अभी ख़्वाहिश-ए-बाल-ओ-पर कीजिए

मोहब्बत तर्क की मैं ने गरेबाँ सी लिया मैं ने

मोहब्बत तर्क की मैं ने गरेबाँ सी लिया मैं ने
ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैं ने

अभी ज़िंदा हूँ लेकिन सोचता रहता हूँ ख़ल्वत में
कि अब तक किस तमन्ना के सहारे जी लिया मैं ने

उन्हें अपना नहीं सकता मगर इतना भी क्या कम है
कि कुछ मुद्दत हसीं ख़्वाबों में खो कर जी लिया मैं ने

बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो
बहुत दुख सह लिए मैं ने बहुत दिन जी लिया मैं ने

ये ज़मीं किस क़दर सजाई गई

ये ज़मीं किस क़दर सजाई गई
ज़िंदगी की तड़प बढ़ाई गई

आईने से बिगड़ के बैठ गए
जिन की सूरत जिन्हें दिखाई गई

दुश्मनों ही से भी तो निभ जाए
दोस्तों से तो आश्नाई गई

नस्ल-दर-नस्ल इंतिज़ार रहा
क़स्र टूटे न बे-नवाई गई

ज़िंदगी का नसीब क्या कहिए
एक सीता थी जो सताई गई

हम न अवतार थे न पैग़म्बर
क्यूँ ये अज़्मत हमें दिलाई गई

मौत पाई सलीब पर हम ने
उम्र बन-बास में बिताई गई

ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा

ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा
इस रात की तक़दीर सँवर जाए तो अच्छा

जिस तरह से थोड़ी सी तिरे साथ कटी है
बाक़ी भी उसी तरह गुज़र जाए तो अच्छा

दुनिया की निगाहों में भला क्या है बुरा क्या
ये बोझ अगर दिल से उतर जाए तो अच्छा

वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बरबाद किया है
इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा

संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है

संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
इक धुँद से आना है इक धुँद में जाना है

ये राह कहाँ से है ये राह कहाँ तक है
ये राज़ कोई राही समझा है न जाना है

इक पल की पलक पर है ठहरी हुई ये दुनिया
इक पल के झपकने तक हर खेल सुहाना है

क्या जाने कोई किस पर किस मोड़ पर क्या बीते
इस राह में ऐ राही हर मोड़ बहाना है

हम लोग खिलौना हैं इक ऐसे खिलाड़ी का
जिस को अभी सदियों तक ये खेल रचाना है

संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे

संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे

ये पाप है क्या ये पुन है क्या रीतों पर धर्म की ठहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे

ये भूक भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचियता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे

हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूटा सपना है
हम जन्म बिता कर जाएँगे तुम जन्म गँवा कर जाओगे

हर तरह के जज़्बात का एलान हैं आँखें

हर तरह के जज़्बात का एलान हैं आँखें
शबनम कभी शो’ला कभी तूफ़ान हैं आँखें

आँखों से बड़ी कोई तराज़ू नहीं होती
तुलता है बशर जिस में वो मीज़ान हैं आँखें

आँखें ही मिलाती हैं ज़माने में दिलों को
अंजान हैं हम तुम अगर अंजान हैं आँखें

लब कुछ भी कहें इस से हक़ीक़त नहीं खुलती
इंसान के सच झूट की पहचान हैं आँखें

आँखें न झुकीं तेरी किसी ग़ैर के आगे
दुनिया में बड़ी चीज़ मिरी जान! हैं आँखें

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