ग़ज़ल गाँव -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Ghazal Gaon part 1

ग़ज़ल गाँव -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Ghazal Gaon part 1

जगमगाते हुए शहरों को तबाही देगा

जगमगाते हुए शहरों को तबाही देगा
और क्या मुल्क को मग़रूर सिपाही देगा

पेड़ उम्मीदों का ये सोच के काटा न कभी
फल न आ पायेंगे इसमें तो हवा ही देगा

तुमने ख़ुद ज़ुल्म को मेयारे-हुकूमत समझा
अब भला कौन तुम्हें मसनदे-शाही देगा

जिसमें सदियों से ग़रीबों का लहू जलता हो
वो दिया रोशनी क्‍या देगा, सियाही देगा

मुन्सिफ़े-वक़्त है तू और मैं मज़लूम मगर
तेरा क़ानून मुझे फिर भी सज़ा ही देगा

किसमें हिम्मत है जो सच बात कहेगा राना
कौन है जो कि मेरे हक़ में गवाही देगा

जिसको एहसासे ग़म नहीं होगा

जिसको एहसासे ग़म नहीं होगा
संग होगा सनम नहीं होगा

यूँ अचानक तेरे बिछड़ने का
ग़म तो मुझको भी कम नहीं होगा

तुम न समझोगे मेरे सर का जुनूँ
टूट जायेगा ख़म नहीं होगा

दिल पे ले कर हम एक निशान चले

दिल पे ले कर हम एक निशान चले
तेरी महफ़िल से मेहरबान चले

याद आयेंगे दोस्तों की तरह
दे के ऐसा हम एक निशान चले

न सही फूल, संग ही फेंको
और कुछ देर इम्तहान चले

सिलसिला दोस्ती का क्‍यों टूटे
न सही तीर तो ज़बान चले

हमें मज़दूरों की, मेहनतकशों की याद आती है

हमें मज़दूरों की, मेहनतकशों की याद आती है
इमारत देख कर कारीगरों की याद आती है

नमाज़ें पढ़ के वापस लौटते बच्चों से मिलते ही
न जाने क्‍यों हमें पैग़म्बरों की याद आती है

मैं अपने भाइयों के साथ जब बाहर निकलता हूँ
मुझे यूसुफ़ के जानी दुश्मनों की याद आती है

तुम्हारे शहर की ये रौनक़ें अच्छी नहीं लगतीं
हमें जब गाँव के कच्चे घरों की याद आती है

मेरे बच्चे कभी मुझसे जो पानी माँग लेते हैं
तो पहरों करबला के वाक़यों की याद आती है

ख़ुश्क था जो पेड़ उस पर पत्तियाँ अच्छी लगीं

ख़ुश्क था जो पेड़ उस पर पत्तियाँ अच्छी लगीं
तेरे होंटों पर लरज़ती सिसकियाँ अच्छी लगीं

हर सहूलत थी मयस्सर लेकिन इसके बावजूद
माँ के हाथों की पकाई रोटियाँ अच्छी लगीं

जिसने आज़ादी के क़िस्से भी सुने हों क़ैद में
उस परिन्दे को क़फ़स की तीलियाँ अच्छी लगीं

हाथ उठा के वक़्ते-रुख़्सत जब दुआएँ उसने दीं
उसके हाथों की खनकती चूड़ियाँ अच्छी लगीं

हम बहुत थक-हार के लौटे थे लेकिन जाने क्‍यों
रेंगती, बढ़ती, सरकती चींटियाँ अच्छी लगीं

यो एक शख़्स जो बचपन से मेरे गाँव में है

यो एक शख़्स जो बचपन से मेरे गाँव में है
ये जानता नहीं कोई कि देवताओं में है

जो अपने गाँव की पगडण्डियों पे छोड़ आया
छुपी हुई मेरी अज़मत उसी खड़ाओं में है

तमाम दोस्त हमें छोड़ कर चले भी गये
मगर ये काँटा अभी तक हमारे पाँव में है

लिपट के रोती नहीं हैं कभी शहीदों से
ये हौसला भी हमारे वतन की माँओं में है

अब कहने की ये बात नहीं है लेकिन कहना पड़ता है

अब कहने की ये बात नहीं है लेकिन कहना पड़ता है
एक तुझसे मिलने की ख़ातिर हमें सबसे मिलना पड़ता है

हमें दिन-तारीख़ तो याद नहीं बस इससे अन्दाज़ा कर लो
हम उस मौसम में बिछड़े थे जब गाँव में झूला पड़ता है

माँ-बाप की बूढ़ी आँखों में इक फ़िक्र-सी छायी रहती है
जिस कम्बल में सब सोते थे अब वो भी छोटा पड़ता है

सब कहते हैं ये देस हमारा सोने की इक चिड़िया है
इस बात को वो कैसे माने जिसे भूखा सोना पड़ता है

हम उसके पास से उठ कर जो झूठ-मूठ गये

हम उसके पास से उठ कर जो झूठ-मूठ गये
तमाम बाँध जो बाँधे थे उसने टूट गये

तू हमको छोड़ के जाता है, जा, ख़ुदा हाफ़िज़
मगर ख़ुदा न करे हम जो दूट-फूट गये


घेर लेने को मुझे जब भी बलाएँ आ गयीं
ढाल बन कर सामने माँ की दुआएँ आ गयीं

सूने आँगन की उदासी में इज़ाफ़ा हो गया
चोंच में तिनके लिये जब फ़ाख्ताएँ आ गयीं

 

दिल को मिल गयी ख़ुशी कोई

दिल को मिल गयी ख़ुशी कोई
उसने रक्‍खा सँभाल कर ऐसे

जैसे इस्मत किसी कुँवारी की
जैसे मुफ़लिस के हाथ में पैसे


सितारे पलकों पे अपनी सजाने वाला था
मैं आज जश्ने-तबाही मनाने वाला था

गुज़र गयी कुचलते हुए ये बस जिसको
वो शख़्स लौट के कल गाँव जाने वाला था

क़त्ल भी होगा हमारा तो यहीं पर होगा

क़त्ल भी होगा हमारा तो यहीं पर होगा
फ़ैसला जो भी हो दुश्मन की ज़मीं पर होगा

आओ कुछ देर किसी पेड़ के नीचे बैठें
वरना फिर कोई कहीं, कोई कहीं पर होगा


आरज़ूओ दिले-पामाल की जानिब आना
आसमानो कभी पाताल की जानिब आना

इश्क़ है काम मेरा नाम मुनव्वर राना
मुझसे मिलना हो तो बंगाल की जानिब आना

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