ग़ज़ल गाँव -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Ghazal Gaon part 2

ग़ज़ल गाँव -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Ghazal Gaon part 2

जो उसने लिक्खे थे ख़त कापियों में छोड़ आये

जो उसने लिक्खे थे ख़त कापियों में छोड़ आये
हम आज उसको बड़ी उलझनों में छोड़ आये

अगर हरीफ़ों में होता तो बच भी सकता था
ग़लत किया जो उसे दोस्तों में छोड़ आये

सफ़र का शौक़ भी कितना अजीब होता है
वो चेहरा भीगा हुआ आँसुओं में छोड़ आये

फिर उसके बाद वो आँखें कभी नहीं रोयीं
हम उनको ऐसी गलतफ़हमियों में छोड़ आये

महाज़े-जंग पे जाना बहुत ज़रूरी था
बिलखते बच्चे हम अपने घरों में छोड़ आये

जब एक वाक़या बचपन का हमको याद आया
हम उन परिन्दों को फिर घोंसलों में छोड़ आये

ऐ अहले-सियासत ये क़दम रुक नहीं सकते

ऐ अहले-सियासत ये क़दम रुक नहीं सकते
रुक सकते हैं फ़नकार क़लम रुक नहीं सकते

हाँ, होश ये कहता है कि महफ़िल में ठहर जा
ग़ैरत का तक़ाज़ा है कि हम रुक नहीं सकते

ये क्‍या कि तेरे हाथ भी अब काँप रहे हैं
तेरा तो ये दावा था सितम रुक नहीं सकते

अब धूप हक़ीक़त की है और शौक़ की राहें
ख़्वाबों की घनी छाँव में हम रुक नहीं सकते

हैं प्यार की राहों में अभी सैकड़ों पत्थर
रफ़्तार बताती है क़दम रुक नहीं सकते

एक आस की मारी हुई दुल्हन की तरह है

एक आस की मारी हुई दुल्हन की तरह है
ये ज़िन्दगी टूटे हुए कंगन की तरह है

हर शख़्स मेरे शहर में दुश्मन की तरह है
अब राम का किरदार भी रावन की तरह है

दिलकश भी नज़र आती है धब्बे भी बहुत हैं
ये ज़िन्दगी ज़रदार की उतरन की तरह है

इस दौरे-तरक़्क़ी में भी मुफ़लिस की जवानी
भट्टी में सुलगते हुए ईंधन की तरह है

मुद्दत से तेरे पाँव की आहट से है महरूम
ये दिल भी किसी बाँझ के आँगन की तरह है

हमें भी पेट की ख़ातिर ख़ज़ाना ढूँढ लेना है

हमें भी पेट की ख़ातिर ख़ज़ाना ढूँढ लेना है
इसी फेंके हुए खाने से दाना ढूँढ लेना है

तुम्हें ऐ भाइयो यूँ छोड़ना अच्छा नहीं लेकिन
हमें अब शाम से पहले ठिकाना ढूँढ लेना है

खिलौनों के लिए बच्चे अभी तक जागते होंगे
तुझे ऐ मुफ़लिसी कोई बहाना ढूँढ लेना है

मुसाफ़िर हैं हमें भी शब-गुज़ारी के लिए राना
बजाय मैक़दे के चायख़ाना ढूँढ लेना है

मेरे घर के दरो-दीवार की हालत नहीं देखी

मेरे घर के दरो-दीवार की हालत नहीं देखी
बरसते बादलो, तुमने भी मेरी छत नहीं देखी

जहाँ पर गिन के रोटी भाइयों को भाई देते हैं
सभी चीज़ें वहाँ देखीं मगर बरक़त नहीं देखी

मेरी दौलत, मेरी कार और मेरा घर देखने वालो
सभी देखा, मगर तुमने मेरी मेहनत नहीं देखी

रिसते हुए ज़ख़्मों को दवा भी नहीं मिलती

रिसते हुए ज़ख़्मों को दवा भी नहीं मिलती
अब हमको बुज़ुर्गों से सज़ा भी नहीं मिलती

क्‍या जाने कहाँ होते मेरे फूल-से बच्चे
विरसे में अगर माँ की दुआ भी नहीं मिलती

मुद्दत से तुम्हारा कोई ख़त भी नहीं आया
रस्ते में कहीं बादे-सबा भी नहीं मिलती

जो धूप में जलने का सलीक़ा नहीं रखता
उस पेड़ को पत्तों की क़बा भी नहीं मिलती

लहू में रंग के छींटे मिलाये जाते हैं

लहू में रंग के छींटे मिलाये जाते हैं
मुशायरों में लतीफ़े सुनाये जाते हैं

नया चराग्र जलाते हैं जब भी हम राना
हमें हवाओं के क़िस्से सुनाये जाते हैं


क्या चमन, क्या फ़स्ले-गुल सब कुछ निहाँ हो जायेगा
बुझ गयीं आँखें तो हर मंज़र धुआँ हो जायेगा

राहे-हक़ में मंज़िले-दारो-रसन आने तो दो
जो ज़बाँ रखता है वो भी बेज़बाँ हो जायेगा

काजल से मेरा नाम न लिखिए किताब पर

काजल से मेरा नाम न लिखिए किताब पर
कुछ लोग जल न जायें कहीं इन्तख़ाब पर


रात देखा है बहारों पे ख़िज़ां को हँसते
कोई तोहफ़ा मुझे शायद मेरा भाई देगा


हम सिसकते हुए रिश्तों के कहाँ क़ायल थे
वरना हम, और तुझे दाग़े-जुदाई देते


हम न दिल्ली थे, न मज़दूर की बेटी लेकिन
क़ाफ़िले जो भी इधर आये, हमें लूट गये

सूखा न पसीना कभी पंखे की हवा से

सूखा न पसीना कभी पंखे की हवा से
हम लोग समन्दर से पलट आये हैं प्यासे

ये सोच के दामन मेरे महबूब बचाना
चेहरे पर उभर आयेंगे यादों के मुँहासे


ख़्वाहिशों ने जो बनाये थे वो मीनार गिरे
भाव चढ़ने भी न पाये थे कि बाज़ार गिरे


वो एक गुड़िया जो मेले में कल दुकान में थी
दिनों की बात है पहले मेरे मकान में थी


बड़े लोगों से मिलने में बुराई कुछ नहीं राना
मगर इस पेड़ की शाखें बहुत कमज़ोर होती है


मुसलसल धूप में चलने का ये अंजाम है राना
कि अब पेड़ों के साये भी बुरे मालूम होते हैं

कोई पागल किसी पागल को पकड़ना चाहे

कोई पागल किसी पागल को पकड़ना चाहे
मरमरीं हाथों से मख़मल को पकड़ना चाहे

यूँ ही मैंने तेरे आँचल की तमन्ना की थी
जैसे बच्चा कोई बादल को पकड़ना चाहे


यूँ बुझा है चराग यादों का
जब भी फैले कर्ब के साये

जैसे इकलौता लाल बेवा का
किसी मोटर से दब के मर जाये

लबों पे उसके कभी बद-दुआ नहीं होती

लबों पे उसके कभी बद-दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

मैं एक फ़क़ीर के होंटों की मुस्कुराहट हूँ
किसी से भी मेरी क़ीमत अदा नहीं होती

 

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