ग़ज़लें-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal Part 8

ग़ज़लें-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal Part 8

माना वक़्त बुरा है तो मर जाएँ क्या

माना वक़्त बुरा है तो मर जाएँ क्या
अपनी ही निगाहों से उतर जाएँ क्या

हर चीज़ मेरे मुताबिक हो, जरूरी तो नहीं
इतने से ग़म में जाँ से गुज़र जाएँ क्या

मैंने जीने का वायदा किया है किसी से
मौत को देख वायदे से मुकर जाएँ क्या

फूल की तरह खिलने का माद्दा है मुझमें
बेकार ही तूफाँ में पत्तियों सा बिखर जाएँ क्या

अभी तो पाँव जमाए हैं मेरी हसरतों ने
कोई कुछ कहे तो जड़ से उखड़ जाएँ क्या

जरूरी तो नहीं

हर सवाल का जवाब हो, जरूरी तो नहीं
मोहब्बत में भी हिसाब हो, जरूरी तो नहीं

पढ़नेवाला सब कुछ पढ़ ले, जरूरी तो नहीं
हर चेहरा खुली किताब हो, जरूरी तो नहीं

जवानी जलती सी आग हो, जरूरी तो नहीं
और हर शोर इंक़लाब हो, जरूरी तो नहीं

रिश्ते सब निभ ही जाएँ, जरूरी तो नहीं
बगीचे में सिर्फ गुलाब हो, जरूरी तो नहीं

जो जलता है काश्मीर हो, जरूरी तो नहीं
उबलता झेलम-चनाब हो, जरूरी तो नहीं

लाशों से भरा चुनाव हो, जरूरी तो नहीं
सरहद पे फिर तनाव हो, जरूरी तो नहीं

कुआँ सूख गया गाँव का, पानी खरीदते जाइए

कुआँ सूख गया गाँव का, पानी खरीदते जाइए
आने वाली मौत की कहानी खरीदते जाइए

बूढ़ा बरगद, बूढ़ा छप्पर सब तो ढह गए
शहर से औने-पौने दाम में जवानी खरीदते जाइए

नहीं लहलहाते सरसों, न मिलती मक्के की बालियाँ
बच्चों के लिए झूठी बेईमानी खरीदते जाइए

रिश्तों की बाट नहीं जोहते कोई भी चौक-चौबारे
आप भी झोला भरके बदगुमानी खरीदते जाइए

नींद लूट के ले गई भूख पेट की
सुलाने के लिए दादी-नानी खरीदते जाइए

कहते हैं कि वो गाँव अब भी बच जाएगा
हो सके तो थोड़ी नादानी खरीदते जाइए

कभी खुद का भी दौरा किया कीजिए

कभी खुद का भी दौरा किया कीजिए
जो जहर है निगाहों में पिया कीजिए

झूठी सूरत, झूठी सीरत और झूठा संसार
सच के खिलने का आश्वासन भी दिया कीजिए

हँसी मतलबी, आँसू नकली, बेमानी सब बातें
ज़ुबाँ ही नहीं, तासीर को भी सिया कीजिए

हवा में सारे वायदे, बेशक़्ल सारी तस्वीरें
हिसाब को कभी तो कुछ लिख लिया कीजिए

अपनी जात, अपनी बिरादरी, अपना महकमा
बेवज़ह कुछ दूसरों के लिए भी किया कीजिए

दर्द ज्यादा हो तो बताया कर

दर्द ज्यादा हो तो बताया कर
ऐसे तो दिल में न दबाया कर

रोग अगर बढ़ने लगे बेहिसाब
एक मुस्कराहट से घटाया कर

तबियत खूब बहल जाया करेगी
खुद को धूप में ले के जाया कर

तरावट जरूरी है साँसों को भी
अंदर तक बारिश में भिंगोया कर

तकलीफें सब यूँ निकल जाएँगी
बदन को हवा में उड़ाया कर

ज़ुल्फ़ों को चेहरे पे कितना बेशरम रखते हैं

ज़ुल्फ़ों को चेहरे पे कितना बेशरम रखते हैं
ज़माना अच्छा हो फिर ये भी भरम रखते हैं

ये बारिश छू के उनको उड़ न जाए तो कैसे
बदन में तपिश और साँसों को गरम रखते हैं

कमर जैसे पिसा की मीनार, निगाहें जुम्बिश
अपनी हर इक अदा में कितने हरम रखते हैं

उनको पढ़ कर सब सब पढ़ लिया समझो
वो अपनी तासीर में क्या महरम रखते हैं

वो चलें तो ज़िंदगी, वो रूक जाएँ तो मौत
अपने वजूद में खुदा का करम रखते हैं

जो तुम चाहते हो बस वही मान लेते हैं

जो तुम चाहते हो बस वही मान लेते हैं
झूठ को सच, सच को झूठ जान लेते हैं

अब तक अक्सों में ढूँढते रहे इक दूजे को
चलो आज हम खुद को पहचान लेते हैं

तिनका तिनका जोड़ के आशिया बनाएँ
थोड़ा सा ज़मीन, थोड़ा आसमान लेते हैं

माँगों में सजे तुम्हारे भरी भरी हरियाली
अहसासों में गीता और कुरआन लेते हैं

खुशी की लहरें दौड़ा करें हमारे आँगन में
क्षितिज के आसपास कोई मकान लेते हैं

तेरे बगैर यूँ ही गुज़ारा होता है मेरा

रात रोता है मेरा, सवेरा रोता है मेरा
तेरे बगैर यूँ ही गुज़ारा होता है मेरा

तुम थे तो ज़िंदगी कितनी आसाँ थी
अब हर काम दो-बारा होता है मेरा

किस- किस पल को हिदायत दूँ मैं
हरेक पल ही आवारा होता है मेरा

तुझे नहीं तेरा साया ही तो माँगा था
फ़कीरी किन्हें गवारा होता है मेरा

सपने कहाँ जग-मगाते हैं आँखों में
रौशन नहीं चौ-बारा होता है मेरा

याद में लब हिले, नहीं तो लब जले
जिगर का ऐसा नज़ारा होता है मेरा

कितने अलग चेहरे थे

सच में रिश्ते तुम्हारे- मेरे कुछ गहरे थे
या बुलबुलों की तरह पानी पर ठहरे थे

शोर तो बहुत किया था मेरी हसरतों ने
लेकिन शायद तुम्हारे अहसास बहरे थे

कितनी कोशिश की मैं छाँव बन जाऊँ
ख्वाहिशें तुम्हारे चिलचिलाते दोपहरें थे

कब देखी तुमने हमारे प्यार का सूरज
निगाहों पर तुम्हारे धुन्ध और कोहरे थे

लगता तो था कि हम एक हँसी हँसते हैं
अब मालूम हुआ कितने अलग चेहरे थे

तुम क्या थे मेरे लिए,अब मेरी समझ में आता है

तुम क्या थे मेरे लिए,अब मेरी समझ में आता है
बादल छत पर मेरे , बिना बारिश गुजर जाता है

मेरा घर, मेरे घर की दीवारें और चौक – चौबारे
बिना तेरे अक्स के चेहरा सब का उतर जाता है

सबकी गलियाँ हैं रौशन आफ़ताबी शबनमों से
चाँद मेरी ही गली में ही बुझा-बुझा नज़र आता है

तुम थे तो सब नज़ारे सावन से भींगे-भींगे लगते थे
अब तो निगाहों में बस पतझड़ का मंजर आता है

कितने गुलाब खिला करते थे तुम्हारे हसीं लबों पे
तेरे बग़ैर सब्ज़ बाग़ में बस सूखा शज़र आता है

सच लिखने को कलम में दावात बहुत है

वो कम दिक्खे है लेकिन उस में बात बहुत है
चाँद के जलवे बिखेरने को इक रात बहुत है

हम क्या ना लुटा बैठेंगे तुम्हारी मुलाक़ात को
मुझे लूटने को तेरी निगाहों की मात बहुत है

चलो नहीं छेड़ेंगे तुम्हें हम आइन्दा कभी भी
पर साँप के डसने को उस की जात बहुत है

कैसे और कब बदलेगा यह ख़ौफ़ ज़दा मंज़र
यह मत पूछ,पर तेरी छोटी शुरुआत बहुत है

घर में हो तो बचे हुए हो ,यह ग़लतफ़हमी है
जान लेनी हो तो अपनों की ही घात बहुत है

मजहब को क्या करना है मंदिर -मस्जिद से
फकीरों के भेष में दरिंदों की जमात बहुत है

इक ही कोशिश पर साँसें जब उखड़ने लगीं
नेताजी कहते हैं यहाँ तो मुआमलात बहुत हैं

बहुत ही रंगीन दिखता है टी वी अखबारों में
वरना इस मुल्क की नाज़ुक हालात बहुत है

क्या पता कहाँ पहुँचेंगी मेरी ग़ज़लें बाज़ार में
पर सच लिखने को कलम में दावात बहुत है

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