ग़ज़लें-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal Part 7

ग़ज़लें-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal Part 7

कभी शबनम तो कभी क़यामत लिखो कोई

लिखना है तो बादलों पे इबारत लिखो कोई
कभी शबनम तो कभी क़यामत लिखो कोई

कोहरों के बीच से रास्ता निकल के आएगा
मंज़िलों के ख़िलाफ़ भी बगावत लिखो कोई

फसलें नफरतों की सब कट जाएँगी खुद ही
धरती के सीने पे ऐसी मोहब्बत लिखो कोई

कितनी सदी तक यूँ ही पिसती रहा करेगी
माँ के थके चेहरे पे अब राहत लिखो कोई

तुम कहाँ गुम हो, किस ख़्यालात में गुम हो
दो पल को अपने लिए चाहत लिखो कोई

कुछ अनछुए पल, कुछ अनछुए अहसास
दिल के करीब से बातें निहायत लिखो कोई

अब कैसे कृष्ण, कैसे राम निकलेगा

तेरा न बोलना बहुत देर तक खलेगा
एक न एक दिन तेरा घर भी जलेगा

नज़र बंद हो अपनी बोई नफरतों में
फिर रहीम और कबीर कहाँ मिलेगा

चाँद को चुराके रात को दोष देते हो
इंतज़ार करो, आसमाँ भी पिघलेगा

जाति, धरम, नाम सबसे तो खेल लिया
अब कैसे कृष्ण, कैसे राम निकलेगा

पानी, हवा, मिटटी सब तो बँट गए हैं
किस आँगन में अब गुलाब खिलेगा

सब को बदल दिया खुद को छोड़के
सच को झूठ से और कितना बदलेगा

खुद को सबसे दूर किया है उसने

खुद को सबसे दूर किया है उसने
जब से मुझे मंजूर किया है उसने

इश्क़ की राह इतनी आसान नहीं
करके, जुर्म जरूर किया है उसने

आँखें दरिया, लब समंदर हो गए
हुश्न को ऐसे बेनूर किया है उसने

खुद का अक्स साफ दिखता नहीं
खुद को चकानाचूर किया है उसने

फिर मेरी हँसी से अपनी तस्वीर रँगते क्यूँ हो

मुझे भुला दिया तो रात भर जागते क्यूँ हो
मेरे सपनों में दबे फिर पाँव भागते क्यूँ हो

एक जो कीमती चीज़ थी वो भी खो दी
अब बेवजह इस कदर दुआ माँगते क्यूँ हो

इतना ही आसान था तो पहले बिछड़ जाते
वक़्त की दीवार पे गुज़रे लम्हात टाँगते क्यूँ हो

गर सब निकाल दिया खुरच-खुरच के जिस्म से
फिर मेरी हँसी से अपनी तस्वीर रँगते क्यूँ हो

अपने जहन में संविधान रखता हूँ

मैं अपने कामों में ईमान रखता हूँ
सो सबसे अलग पहचान रखता हूँ

सब इंसान लगते हैं मुझे एक जैसे
तासीर में हमेशा भगवान् रखता हूँ

है महफूज़ जहाँ मुझ जैसे बन्दों से
सच से लैश अपनी जुबान रखता हूँ

बना रहे हिन्दोस्तान मेरा शहंशाह
अपने तिरंगे में ही प्राण रखता हूँ

मुझे तालीम है मिट्टी की खुशबू की
अपने जहन में संविधान रखता हूँ

न जाने किनका ख्याल आ गया

न जाने किनका ख्याल आ गया
रूखे-रौशन पे जमाल आ गया

जो झटक दिया इन जुल्फों को
ज़माने भर का सवाल आ गया

मैं मदहोश न हो जाती क्यों-कर
खुशबू बिखेरता रूमाल आ गया

मैं मिट जाऊँगी अपने दिलबर पे
बदन तोड़ता जालिम साल आ गया

मेरे हर अंग पे है नाम उसकी का
यूँ ही नहीं हुश्न में कमाल आ गया

जो परिन्दे डरते हैं हवाओं के बदलते रूख से

जो मकाँ बनाते हैं, वो अपना घर नहीं बना पाते
रेगिस्तान में उगने वाले पौधे जड़ नहीं बना पाते

जिन्हें आदत हैं औरों के रहमो-करम पे जीने के
वो कूबत होते हुए भी अपना डर नहीं बना पाते

जो पहचानते हैं इंसानों को सिर्फ औकात से
वो कभी किसी के दिल तक दर नहीं बना पाते

जो परिन्दे डरते हैं हवाओं के बदलते रूख से
वो सारे उड़ने के लिए अपना पर नहीं बना पाते

जिनकी जवानी बन गई जीहुजूरी का दूसरा नाम
वो ज़ुल्म के खिलाफ उठने वाला सर नहीं बना पाते

शाम ढले तुम छत पे क्यूँ आते हो

शाम ढले तुम छत पे क्यूँ आते हो
मुझे मालूम है चाँद को जलाते हो

तुम से ही नहीं रौशन ये जहाँ सारा
मुस्कुराकर तुम उसे यह बताते हो

होंगे सितारे तुम्हारे हुश्न पर लट्टू
गिराके दुपट्टा ये गुमाँ भी भुलाते हो

हुई पुरानी तुम्हारी अदाओं की तारीफें
रोककर सबकी साँसें उसे जताते हो

अमावस का डर भी तो है उसे पल-पल
तुम बेधड़क जलवा रोज़ दिखाते हो

कर दे वो रातें सबकी काली, कोई फर्क नहीं
खिलखिला के तुम दो जहाँ जगमगाते हो

 

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