ग़ज़लें-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal Part 2

ग़ज़लें-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal Part 2

जिसे जन्नत कहते हैं, वो हिन्दुस्तान हर घड़ी दिखाएँगे

कुछ इस तरह अपने कलम की जादूगरी दिखाएँगे
किसी की ज़ुल्फ़ों में लहलहाते खेत हरी-भरी दिखाएँगे

छोड़ो उस आसमाँ के चाँद को, मगरूर बहुत है
रातों को अपनी गली में हम चाँद बड़ी-बड़ी दिखाएँगे

किस्सों में जो अब तक तुम सुनते आए सदियों से
मेरा मुँह चूमता हुआ तुम्हें वही पुरनम परी दिखाएँगे

हम यूँ कर देंगे कि भूले नहीं भूलोगे ये शमा
हुश्न के महल में काबिज़ आफताब संगमरमरी दिखाएँगे

जहाँ भी चले जाओ, इतना ही हुश्न बरपा है हर जगह
जिसे जन्नत कहते हैं, वो हिन्दुस्तान हर घड़ी दिखाएँगे

मुझे मेरी मौत का फरिश्ता चाहिए

हर रोज़ ही कोई नई खता चाहिए
इस दिल को दर्द का पता चाहिए

कब तक होगा झूठा खैर मकदम
मुझे अब बेरुख़ी का अता चाहिए

अच्छे लगते ही नहीं सूनी मंज़िलें
काँटों से ही भरा रास्ता चाहिए

मेरा इश्क़ सबसे निभ नहीं पाएगा
सो हमनबा भी कोई सस्ता चाहिए

जिंदगी बोझिल है अब इस कदर
मुझे मेरी मौत का फरिश्ता चाहिए

(अता-दान)

कोई क़यामत न कोई करीना याद आता है

कोई क़यामत न कोई करीना याद आता है
जब दुपट्टे से तेरा मुँह छिपाना याद आता है

एक लिहाफ में सिमटी न जाने कितनी रातें
यक ब यक दिसम्बर का महीना याद आता है

ज़ुल्फ़ की पेंचों में छिपा तेरा शफ्फाक चेहरा
किसी भँवर में पेशतर सफीना याद आता है

छाती, सीना, नाफ, कमर सब के सब लाजवाब
उर्वशी, मेनका, रम्भा का ज़माना याद आता है

जिस तरह मैं हो गया हूँ तेरे हुश्न का कायल
क्या तुझे भी मुझ सा दीवाना याद आता है

आज वो भी जुल्म के शिकार हुए जो जुल्म किया करते थे

आज वो भी जुल्म के शिकार हुए जो जुल्म किया करते थे
भगवान की भी हम जात देख लेंगे सरे आम कहा करते थे

इनको न काशी न ही कुम्भ की कोई समझ थी कभी
जो गंगा को हिन्दू और यमुना को मुसलमान कहा करते थे

भाईचारे की राख और इंसानियत की आधी लाशों से
नदी की हर तट को जीता जागता मसान कहा करते थे

इन नदियों, इन घाटों, इन मेलों का कौन धर्म तय करेगा
वो जो कल तक गैर बिरादरी को श्मशान कहा करते थे

संस्कृति को सिर्फ बचाना नहीं समझाना भी पड़ता है
वो मानेंगे जो खुद को महान, औरों को शैतान कहा करते थे

ज़माने से हुई ख़बर कि मैं सुधर गया

ज़माने से हुई ख़बर कि मैं सुधर गया
फिर वो कौन था जो मेरे अंदर मर गया

दूसरों की निगाहों से जो देखा खुद को आज
देख कर अपना ही चेहरा क्यों डर गया

वो अल्हड़पन, वो लड़कपन कल तक जो था
आज ढूँढा बहुत, ना जाने किधर गया

मैं खोजता रहा खुद को स्टेशन की तरह
संसार रेल की तरह मुझसे गुज़र गया

मैं खोजता रहा जहाँ की तयशुदा मंज़िलें
मीलों चलके भी खाली मेरा सफर गया

कौन पहचानेगा मुझे बदले हालातों में
अपने भी ठुकरा देंगे, मैं घर अगर गया

जो दोस्त बनके नसीहतें देता रहा ताउम्र
ज्योंहि जरूरत पड़ी तो वो मुकर गया

मुझे बदलना था उसे, सो मुझे बदल गया
आदमी को मशीन बनाने का काम कर गया

किराए पे रह कर भी तो सदी गुजरती है

मैं उसके दिल में रहा, पर उसका हो न सका
किराए पे रह कर भी तो सदी गुजरती है

हर दिए से रोशनी आए ये कोई शर्त तो नहीं
पहाड़ों से छिटक कर भी रोशनी बिखरती है

आईना ही आखिरी मुंतजिर नहीं हुस्न का
धूल और मिट्टी में भी मूर्तियाँ सँवरती हैं

आसमाँ को तो कई दफे इक्तिला ही नही होता
जब धूप खिली हो तब भी बारिश बरसती है

ये धुआँ यूँ ही नहीं उठने लगा है यहाँ से
पास ही किसी हादसे में बच्चियाँ गरजती है

ये आँखों से बहे हैं ‘सलिल’, रंग जरूर लाएँगे
मंसूबों में आह न हो तो ये नहीं ढलकती हैं

एक अरसे से मैं बुझा ही नहीं

एक अरसे से मैं बुझा ही नहीं
मैं कश्मीर हूँ, जलना ही मेरी नीयत है क्या

रावी तो कभी चेनाब से धुआँ उठता है
चिनार से पूछो ये अच्छी तबियत है क्या

सेब के बगीचे वो केसर की क्यारियाँ
खुशबू बिखेरती फ़ज़ा हो गई रुखसत है क्या

डल झील के शिकारों में गूँजता था जो जलतरंग
उस मौशिकी की आगोश में कोई दहशत है क्या

वो गुलमर्ग की चमचमाती बर्फ की परछाइयाँ
अब किसी ज़ुल्म की नाज़ायज़ दौलत हैं क्या

जो रहा है मेरे बदन का ताज सदा से
देखो तो जरा गौर से, खून से लथपथ है क्या

मंदिरों में आरती, मस्जिदों में अजान होता नहीं

वो आँखों में होता है जो निगाहों में होता नहीं
जो हो इश्क़ में उसे फिर कोई होश होता नहीं

दवा, दुआ, शाइस्तगी, हमनफ्सगी सब बेकार
वो ज़ख़्म भी दें तो दर्द जरा भी होता नहीं

मीर, मोमिन, ग़ालिब, दाग सब को पढ़ डाला
लफ्ज़ अपना न हो तो इश्क़ पूरा होता नहीं

वो नज़रें ना उठाएँ वल्लाह वो नज़रें न झुकाएँ तो
इस ज़मीं पे कहीं दिन, कहीं रात होता नहीं

बिना उसकी बंदगी, बिना उसकीकी शागिर्दी के
मंदिरों में आरती, मस्जिदों में अजान होता नहीं

चलो आज पर्दा करने की रवायत ही गिरा देते हैं

चलो आज पर्दा करने की रवायत ही गिरा देते हैं
निगाहों में कुछ आरज़ू जला लेते है, कुछ बुझा देते हैं

आने वाली तमाम नस्ल की खातिर ही सही
एक चाँद आसमाँ तो दूजा हथेली पर उगा देते हैं

हो गया सारा मंज़र लहू लुहान और ये चुप रहा
मगरूर सूरज को अँधेरे में छिपाकर सज़ा देते हैं

सियासी हलफनामों का शोर बंद कर के
कुछ देर हम मासूमों को भी ज़बाँ देते है

तुम आओ जो बनके आफ़ताब कभी, तो फिर
हम खूबसूरती के पैमाने तमाम छिपा देते हैं

तुम जब चले गए तो फिर हमें आए याद बहुत

तुम जब चले गए तो फिर हमें आए याद बहुत
जिस गुलशन को बसाया था, हुआ वो बर्बाद बहुत

सब गलियाँ है सूनी, सब रास्ते हो गए उदास बहुत
दिन है मेरा सोया सोया, और जागा है रात बहुत

जहाँ तक देखा था वो भी कम कुछ नहीं था
लेकिन कई अफसाने छिपे थे उसके बाद बहुत

जब था मौका तो रोक नहीं पाए जाते कदमों को
अब होगा भी क्या करके यूँ भी फरियाद बहुत

अगर रोने से ही खुश हासिल है तो हैं हम शायद बहुत
तुम्हें समझ नहीं पाया, दिल हमारा था सैय्याद बहुत

 

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