ग़ज़लें-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal Part 1

ग़ज़लें-सरवरिन्दर गोयल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sarvarinder Goyal Part 1

वो सीने से लगकर यूँ रो दिए

वो सीने से लगकर यूँ रो दिए
जितने भी पाप थे, सारे धो दिए

छूके अपनी जादुई निगाहों से
जवानी के कितने वसंत बो दिए

हर पल हीरा हर पल जवाहरात
अपनी ज़िंदगी के पल उसने जो दिए

साँसों के महीन धागे में चुन चुनकर
तासीर के बेशकीमती मोती पिरो दिए

माँगने की इन्तहां और भी होती है क्या
जो इशारा किया, झोली भर के सो दिए

मुझे खुदा ही बना दिया अपनी महब्बत से
खुदको दरिया सा मुझ समन्दर में खो दिए

ये चाक जिगर के सीना भी जरूरी है

ये चाक जिगर के सीना भी जरूरी है
कुछ रोज़ खुद को जीना भी जरूरी है

ज़िंदगी रोज़ ही नए कायदे सिखाती है
बेकायदे होके कभी पीना भी जरूरी है

सब यूँ ही दरिया पार कर जाएँगे क्या
सबक को डूबता सफीना भी जरूरी है

जिस्म सिमट के पूरा ठंडा न पड़ जाए
साल में जून का महीना भी जरूरी है

सिर्फ जान पहचान ही काफी नहीं होती
नाम कमाना है, तो पसीना भी जरूरी है

आप तो इस शहर से वाकिफ़ हैं

आप तो इस शहर से वाकिफ़ हैं, आपने ये हलफ उठाया होता
सूरज जो सोया है यहाँ वर्षों से, उसको भी कभी जगाया होता

आप बाँटते रहे नफरतों की आयतें शहर की दरों-दीवार पर
गलती से ही सही कभी तो प्यार का तराना भी गुनगुनाया होता

वीरान गली, वीरान मकाँ, वीरान वक़्त और ये वीरान जहाँ सारा
अपनी सदाओं को इन खेत, इन खलिहानों को ही सुनाया होता

तुम्हारी जगह आज खिलौनों ने ले ली है, अजीब रिवाज़ है यहाँ
न होती ये हालत अगर तुमने बच्चों को नींद में थपकाया होता

भूख, चैन, सुख, लालसा, जवानी सब खो दिया इस शहर में आके
काश कि कोई मुझे भी मेरी माँ की तरह आके थोड़ा मनाया होता

आज तुम्हारा घर जला तो शहर में तुम्हें खौफ का इल्म हुआ है
क्यों होता हादसा गर तुमने पहले ही जलते घर को बचाया होता

वो मुझे मेरी हद कुछ यूँ बताने लगा

वो मुझे मेरी हद कुछ यूँ बताने लगा
जो डूबा मेरे रंग में, बेहद बताने लगा

इक आँधी चली और नेस्तोनाबूत हो गया
वो दिया जो कल सूरज का कद बताने लगा

जहाँ भी मिले अपनों के सर कटे हुए लाश
अखबार उसी को बारहां सरहद बताने लगा

पहले आँख फोड़ते हैं और फिर चश्मा बेचते हैं
कोई पूछे ये माजरा तो मदद बताने लगा

जिसको भी मौका मिला उसने ही लूटा है
वो रोज़ की जुल्मपरस्ती को अदद बताने लगा

यूँ तो तय नहीं होगा अब मंज़िल का सबब
धूप में चलने वाला हर पेड़ को बरगद बताने लगा

जिसकी उम्र गुज़र गई लंका जैसी नगरी में
मौका मिलते ही खुद को सुग्रीव और अंगद बताने लगा

बेटा ने कमाना शुरू किया और ये हादसा हुआ
बात-बात पर अपने बाप की आमद बताने लगा

सियासत

तुम संभल के रहना, वो जीना मुहाल कर देगा
ये सियासत है प्यारे, दो पल में बेहाल कर देगा

वो ताँक में बैठा है तुम्हारे हर एक कदम पर ही
तुम गलतियाँ भी नहीं करोगे, वो सवाल कर देगा

अपनी ही परछाईं कैसे खुद को डराने लगती है
तुम कुछ देर तो ठहरो, वो ये भी कमाल कर देगा

इनको वजीफा मिला हुआ है इसी तालीम में
संविधान को मशान और झंडे को रूमाल कर देगा

तुम्हारे ही मुद्दे, जिन्हें सदन में इन्हें उठाना था
उस पर कभी जो बात करो तो बबाल कर देगा

मत उलझना बहुत देर तलक इस महकमे में
तुम्हें फटेहाल, बदहाल और फिर हलाल कर देगा

देखना ये है कि नफरत को ढाहता कौन है

तुम चले गए तो ये अहसास हुआ मुझे
ज़िन्दगी भर यूँ भी साथ रहता कौन है

सब को यही इल्म था कि सभी सही हैं
ज़माने में गलत को गलत कहता कौन है

खून में गर्मी बढ़ गई है इस कदर कि अब
बात गर छोटी भी हो तो सहता कौन है

ऐसे तो सारे ही सुखनबार है हमारे यहाँ
मुद्दा है कि बुरे वक्त में हमें चाहता कौन है

खड़ी तो कर दी सब ने ही मिलके दीवार
देखना ये है कि नफरत को ढाहता कौन है

तुम दाखिल होना मेरे दिल में कुछ इस कदर कि

तुम दाखिल होना मेरे दिल में कुछ इस कदर कि
शोर उठे यहाँ से तो बस तेरे नाम की ही उठे

आग लगाना तो फिर ख्याल इतना जरूर रखना
ये शोला बुझे तो फिर तेरे शबाब से ही बुझे

मैंने हलफनामा तो नहीं डाला तेरे इकरार का
ले जाएगी जहन्नुम तक तेरा इन्कार ही मुझे

पास हूँ तो अहसासों के काबिल नहीं हूँ मैं
दूर जाऊँगा तो कर जाऊँगा बेशक बेक़रार ही तुझे

मुकम्मल न हो पर इश्क़ मुसलसल तो हो
फिर क्या फर्क पड़ता है रहें सारे अफसाने ही अनसुलझे

छूते ही उसे जल तरंग बज उठता है

छूते ही उसे जल तरंग बज उठता है
पानी से बना सारा ही जिस्म हो जैसे

उसकी आँखों में देखूँ तो सब भूल जाऊँ
उसकी गहरी आँखों में तिलिस्म हो जैसे

वो हँसे तो गालों में लाली उभर आए
किसी गुलाब का ताज़ा किस्म हो जैसे

क्या नैन, क्या नक्स सब इस जहाँ से परे
खुदा ने तराशा कोई मुज्जसम हो जैसे

तुमसे ही दुनिया जीने के काबिल है अभी
तुम्हें देख बेकशी खुद भस्म हो जैसे

तू मेरा कल नही, तू मेरा आज नहीं

तू मेरा कल नही, तू मेरा आज नहीं
तेरे मेरे दरम्यान अब कोई राज़ नहीं

तूने बुलाने में बहुत देर कर दी हमनशीं
सफर से लौट आने का रिवाज नहीं

तेरा नूर भले माहताब होगा ज़माने में
बेपर्दा हुश्न पर हमें तो कोई नाज़ नहीं

हुश्न की फिदरत है हर शय में बदल जाना
इश्क़ के यूँ बेअदब हो जाने के अंदाज़ नहीं

तुम तड़पोगी, तुम तरसोगी हमारे लिए
मेरी जुदाई में आह होगी, आवाज़ नहीं

 

 

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