ग़ज़लें-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 3

ग़ज़लें-राहत इन्दौरी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rahat Indori Part 3

आँख प्यासी है कोई मन्ज़र दे

आँख प्यासी है कोई मन्ज़र दे,
इस जज़ीरे को भी समन्दर दे

अपना चेहरा तलाश करना है,
गर नहीं आइना तो पत्थर दे

बन्द कलियों को चाहिये शबनम,
इन चिराग़ों में रोशनी भर दे

पत्थरों के सरों से कर्ज़ उतार,
इस सदी को कोई पयम्बर दे

क़हक़हों में गुज़र रही है हयात,
अब किसी दिन उदास भी कर दे

फिर न कहना के ख़ुदकुशी है गुनाह,
आज फ़ुर्सत है फ़ैसला कर दे

कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो

कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो
ये सब तुम्हारे ही घर हैं किसी भी घर में रहो

जला न लो कहीं हमदर्दियों में अपना वजूद
गली में आग लगी हो तो अपने घर में रहो

तुम्हें पता ये चले घर की राहतें क्या हैं
हमारी तरह अगर चार दिन सफ़र में रहो

है अब ये हाल कि दर दर भटकते फिरते हैं
ग़मों से मैं ने कहा था कि मेरे घर में रहो

किसी को ज़ख़्म दिए हैं किसी को फूल दिए
बुरी हो चाहे भली हो मगर ख़बर में रहो

जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से

जा के ये कह दे कोई शोलों से चिंगारी से
फूल इस बार खिले हैं बड़ी तय्यारी से

अपनी हर साँस को नीलाम किया है मैं ने
लोग आसान हुए हैं बड़ी दुश्वारी से

ज़ेहन में जब भी तिरे ख़त की इबारत चमकी
एक ख़ुश्बू सी निकलने लगी अलमारी से

शाहज़ादे से मुलाक़ात तो ना-मुम्किन है
चलिए मिल आते हैं चल कर किसी दरबारी से

बादशाहों से भी फेंके हुए सिक्के न लिए
हम ने ख़ैरात भी माँगी है तो ख़ुद्दारी से

जब कभी फूलों ने ख़ुश्बू की तिजारत की है

जब कभी फूलों ने ख़ुश्बू की तिजारत की है
पत्ती पत्ती ने हवाओं से शिकायत की है

यूँ लगा जैसे कोई इत्र फ़ज़ा में घुल जाए
जब किसी बच्चे ने क़ुरआँ की तिलावत की है

जा-नमाज़ों की तरह नूर में उज्लाई सहर
रात भर जैसे फ़रिश्तों ने इबादत की है

सर उठाए थीं बहुत सुर्ख़ हवा में फिर भी
हम ने पलकों के चराग़ों की हिफ़ाज़त की है

मुझे तूफ़ान-ए-हवादिस से डराने वालो
हादसों ने तो मिरे हाथ पे बैअत की है

आज इक दाना-ए-गंदुम के भी हक़दार नहीं
हम ने सदियों इन्हीं खेतों पे हुकूमत की है

ये ज़रूरी था कि हम देखते क़िलओं के जलाल
उम्र भर हम ने मज़ारों की ज़ियारत की है

दोस्ती जब किसी से की जाये

दोस्ती जब किसी से की जाये
दुश्मनों की भी राय ली जाये

मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में,
अब कहाँ जा के साँस ली जाये

बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ,
ये नदी कैसे पार की जाये

मेरे माज़ी के ज़ख़्म भरने लगे,
आज फिर कोई भूल की जाये

बोतलें खोल के तो पी बरसों,
आज दिल खोल के भी पी जाये

ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े

ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े
इशारा कर दें तो सूरज ज़मीं पे आन पड़े

सुकूत-ए-ज़ीस्त को आमादा-ए-बग़ावत कर
लहू उछाल कि कुछ ज़िंदगी में जान पड़े

हमारे शहर की बीनाइयों पे रोते हैं
तमाम शहर के मंज़र लहू-लुहान पड़े

उठे हैं हाथ मिरे हुर्मत-ए-ज़मीं के लिए
मज़ा जब आए कि अब पाँव आसमान पड़े

किसी मकीन की आमद के इंतिज़ार में हैं
मिरे मोहल्ले में ख़ाली कई मकान पड़े

वफ़ा को आज़माना चाहिए था

वफ़ा को आज़माना चाहिए था, हमारा दिल दुखाना चाहिए था
आना न आना मेरी मर्ज़ी है, तुमको तो बुलाना चाहिए था

हमारी ख्वाहिश एक घर की थी, उसे सारा ज़माना चाहिए था
मेरी आँखें कहाँ नाम हुई थीं, समुन्दर को बहाना चाहिए था

जहाँ पर पंहुचना मैं चाहता हूँ, वहां पे पंहुच जाना चाहिए था
हमारा ज़ख्म पुराना बहुत है, चरागर भी पुराना चाहिए था

मुझसे पहले वो किसी और की थी, मगर कुछ शायराना चाहिए था
चलो माना ये छोटी बात है, पर तुम्हें सब कुछ बताना चाहिए था

तेरा भी शहर में कोई नहीं था, मुझे भी एक ठिकाना चाहिए था
कि किस को किस तरह से भूलते हैं, तुम्हें मुझको सिखाना चाहिए था

ऐसा लगता है लहू में हमको, कलम को भी डुबाना चाहिए था
अब मेरे साथ रह के तंज़ ना कर, तुझे जाना था जाना चाहिए था

क्या बस मैंने ही की है बेवफाई,जो भी सच है बताना चाहिए था
मेरी बर्बादी पे वो चाहता है, मुझे भी मुस्कुराना चाहिए था

बस एक तू ही मेरे साथ में है, तुझे भी रूठ जाना चाहिए था
हमारे पास जो ये फन है मियां, हमें इस से कमाना चाहिए था

अब ये ताज किस काम का है, हमें सर को बचाना चाहिए था
उसी को याद रखा उम्र भर कि, जिसको भूल जाना चाहिए था

मुझसे बात भी करनी थी, उसको गले से भी लगाना चाहिए था
उसने प्यार से बुलाया था, हमें मर के भी आना चाहिए था

शहरों-शहरों गाँव का आँगन याद आया

शहरों-शहरों गाँव का आँगन याद आया
झूठे दोस्त और सच्चा दुश्मन याद आया

पीली पीली फसलें देख के खेतों में
अपने घर का खाली बरतन याद आया

गिरजा में इक मोम की मरियम रखी थी
माँ की गोद में गुजरा बचपन याद आया

देख के रंगमहल की रंगीं दीवारें
मुझको अपना सूना आँगन याद आया

जंगल सर पे रख के सारा दिन भटके
रात हुई तो राज-सिंहासन याद आया

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची

तीरगी चांद के ज़ीने से सहर तक पहुँची
ज़ुल्फ़ कन्धे से जो सरकी तो कमर तक पहुँची

मैंने पूछा था कि ये हाथ में पत्थर क्यों है,
बात जब आगे बढी़ तो मेरे सर तक पहुँची

मैं तो सोया था मगर बारहा तुझ से मिलने,
जिस्म से आँख निकल कर तेरे घर तक पहुँची

तुम तो सूरज के पुजारी हो तुम्हे क्या मालुम,
रात किस हाल में कट-कट के सहर तक पहुँची

एक शब ऐसी भी गुजरी है खयालों में तेरे,
आहटें जज़्ब किये रात सहर तक पहुँची

दिए बुझे हैं मगर दूर तक उजाला है

दिए बुझे हैं मगर दूर तक उजाला है
ये आप आए हैं या दिन निकलने वाला है

नई सहर है नया ग़म नया उजाला है
रज़ाई छोड़ दी अब दिन निकलने वाला है

ख्याल में भी तेरा अक्स देखने के बाद
जो शख्स होश गेंवा दे वो होश वाला है

जवाब देने के अन्दाज़ भी निराले हैं,
सलाम करने का अन्दाज़ भी निराला है

सुनहरी धूप है सदका तेरे तबस्तुम का,
ये चाँदनी तेरी परछाई का उजाला है

है तेरे पैरों की आहट ज़मीन की गर्दिश,
ये आसमाँ तेरी अँगड़ाई का हवाला है

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