ग़ज़लें -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Ghazlein Part 1

ग़ज़लें -मुनव्वर राना -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Munnawar Rana Ghazlein Part 1

अच्छा हुआ कि मेरा नशा भी उतर गया

अच्छा हुआ कि मेरा नशा भी उतर गया
तेरी कलाई से ये कड़ा भी उतर गया

वो मुतमइन बहुत है मिरा साथ छोड़ कर
मैं भी हूँ ख़ुश कि क़र्ज़ मिरा भी उतर गया

रुख़्सत का वक़्त है यूँही चेहरा खिला रहे
मैं टूट जाऊँगा जो ज़रा भी उतर गया

बेकस की आरज़ू में परेशाँ है ज़िंदगी
अब तो फ़सील-ए-जाँ से दिया भी उतर गया

रो-धो के वो भी हो गया ख़ामोश एक रोज़
दो-चार दिन में रंग-ए-हिना भी उतर गया

पानी में वो कशिश है कि अल्लाह की पनाह
रस्सी का हाथ थामे घड़ा भी उतर गया

वो मुफ़्लिसी के दिन भी गुज़ारे हैं मैं ने जब
चूल्हे से ख़ाली हाथ तवा भी उतर गया

सच बोलने में नश्शा कई बोतलों का था
बस ये हुआ कि मेरा गला भी उतर गया

पहले भी बे-लिबास थे इतने मगर न थे
अब जिस्म से लिबास-ए-हया भी उतर गया

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए
इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए

आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए

ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आप को औरत नहीं अख़बार होना चाहिए

ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें
टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए

अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे
इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए

ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे

ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे
मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे

मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत
कब तलक देखिए रखता है वो आबाद मुझे

एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया
इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे

कम से कम ये तो बता दे कि किधर जाएगी
कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे

मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है
मेरे जिस शे’र पे मिलती है बहुत दाद मुझे

काले कपड़े नहीं पहने हैं तो इतना कर ले

काले कपड़े नहीं पहने हैं तो इतना कर ले
इक ज़रा देर को कमरे में अँधेरा कर ले

अब मुझे पार उतर जाने दे ऐसा कर ले
वर्ना जो आए समझ में तिरी दरिया कर ले

ख़ुद-ब-ख़ुद रास्ता दे देगा ये तूफ़ान मुझे
तुझ को पाने का अगर दिल ये इरादा कर ले

आज का काम तुझे आज ही करना होगा
कल जो करना है तो फिर आज तक़ाज़ा कर ले

अब बड़े लोगों से अच्छाई की उम्मीद न कर
कैसे मुमकिन है करैला कोई मीठा कर ले

गर कभी रोना ही पड़ जाए तो इतना रोना
आ के बरसात तिरे सामने तौबा कर ले

मुद्दतों बा’द वो आएगा हमारे घर में
फिर से ऐ दिल किसी उम्मीद को ज़िंदा कर ले

हम-सफ़र लैला भी होगी मैं तभी जाऊँगा
मुझ पे जितने भी सितम करने हों सहरा कर ले

ख़ुद अपने ही हाथों का लिखा काट रहा हूँ

ख़ुद अपने ही हाथों का लिखा काट रहा हूँ
ले देख ले दुनिया मैं पता काट रहा हूँ

ये बात मुझे देर से मा’लूम हुई है
ज़िंदाँ है ये दुनिया मैं सज़ा काट रहा हूँ

दुनिया मिरे सज्दे को इबादत न समझना
पेशानी पे क़िस्मत का लिखा काट रहा हूँ

अब आप की मर्ज़ी है इसे जो भी समझिए
लेकिन मैं इशारे से हवा काट रहा हूँ

तू ने जो सज़ा दी थी जवानी के दिनों में
मैं उम्र की चौखट पे खड़ा काट रहा हूँ

चले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम ने

चले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम ने
बढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने

पड़ा रहने दो अपने बोरिए पर हम फ़क़ीरों को
फटी रह जाएँगी आँखें जो मुट्ठी खोल दी हम ने

कहाँ तक बोझ बैसाखी का सारी ज़िंदगी ढोते
उतरते ही कुएँ में आज रस्सी खोल दी हम ने

फ़रिश्तो तुम कहाँ तक नामा-ए-आमाल देखोगे
चलो ये नेकियाँ गिन लो कि गठरी खोल दी हम ने

तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्ता
तुम्हारी याद आई और खिड़की खोल दी हम ने

पुराने हो चले थे ज़ख़्म सारे आरज़ूओं के
कहो चारागरों से आज पट्टी खोल दी हम ने

तुम्हारे दुख उठाए इस लिए फिरते हैं मुद्दत से
तुम्हारे नाम आई थी जो चिट्ठी खोल दी हम ने

तुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती है

तुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती है
ख़बर तुम्हारी भी अब दूसरों से आती है

हमीं अकेले नहीं जागते हैं रातों में
उसे भी नींद बड़ी मुश्किलों से आती है

हमारी आँखों को मैला तो कर दिया है मगर
मोहब्बतों में चमक आँसुओं से आती है

इसी लिए तो अँधेरे हसीन लगते हैं
कि रात मिल के तिरे गेसुओं से आती है

ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया मोहब्बत ने
कि तेरी याद भी अब कोशिशों से आती है

नुमाइश के लिए गुलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं

नुमाइश के लिए गुलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं
लड़ाई की मगर तैयारियाँ दोनों तरफ़ से हैं

मुलाक़ातों पे हँसते, बोलते हैं, मुस्कराते हैं
तबीयत में मगर बेज़ारियाँ दोनों तरफ़ से हैं

खुले रखते हैं दरवाज़े दिलों के रात-दिन दोनों
मगर सरहद पे पहरेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं

उसे हालात ने रोका मुझे मेरे मसायल ने
वफ़ा की राह में दुश्वारियाँ दोनों तरफ़ से हैं

मेरा दुश्मन मुझे तकता है, मैं दुश्मन को तकता हूँ
कि हायल राह में किलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं

मुझे घर भी बचाना है वतन को भी बचाना है
मिरे कांधे पे ज़िम्मेदारियाँ दोनों तरफ़ से हैं

पैरों को मिरे दीदा-ए-तर बाँधे हुए है

पैरों को मिरे दीदा-ए-तर बाँधे हुए है
ज़ंजीर की सूरत मुझे घर बाँधे हुए है

हर चेहरे में आता है नज़र एक ही चेहरा
लगता है कोई मेरी नज़र बाँधे हुए है

बिछड़ेंगे तो मर जाएँगे हम दोनों बिछड़ कर
इक डोर में हम को यही डर बाँधे हुए है

पर्वाज़ की ताक़त भी नहीं बाक़ी है लेकिन
सय्याद अभी तक मिरे पर बाँधे हुए है

हम हैं कि कभी ज़ब्त का दामन नहीं छोड़ा
दिल है कि धड़कने पे कमर बाँधे हुए है

आँखें तो उसे घर से निकलने नहीं देतीं
आँसू है कि सामान-ए-सफ़र बाँधे हुए है

फेंकी न ‘मुनव्वर’ ने बुज़ुर्गों की निशानी
दस्तार पुरानी है मगर बाँधे हुए है

मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं

मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं
किसी भी सीने को खोलो तो ग़म निकलते हैं

हमारे जिस्म के अंदर की झील सूख गई
इसी लिए तो अब आँसू भी कम निकलते हैं

ये कर्बला की ज़मीं है इसे सलाम करो
यहाँ ज़मीन से पत्थर भी नम निकलते हैं

यही है ज़िद तो हथेली पे अपनी जान लिए
अमीर-ए-शहर से कह दो कि हम निकलते हैं

कहाँ हर एक को मिलते हैं चाहने वाले
नसीब वालों के गेसू में ख़म निकलते हैं

जहाँ से हम को गुज़रने में शर्म आती है
उसी गली से कई मोहतरम निकलते हैं

तुम्ही बताओ कि मैं खिलखिला के कैसे हँसूँ
कि रोज़ ख़ाना-ए-दिल से अलम निकलते हैं

तुम्हारे अहद-ए-हुकूमत का सानेहा ये है
कि अब तो लोग घरों से भी कम निकलते हैं

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं

मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं

कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं

हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा
लिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा

शेयर-बाज़ार में क़ीमत उछलती गिरती रहती है
मगर ये ख़ून-ए-मुफ़्लिस है कभी महँगा नहीं होगा

तिरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में
हमारा घर तिरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा

हमारी दोस्ती के बीच ख़ुद-ग़र्ज़ी भी शामिल है
ये बे-मौसम का फल है ये बहुत मीठा नहीं होगा

पुराने शहर के लोगों में इक रस्म-ए-मुरव्वत है
हमारे पास आ जाओ कभी धोका नहीं होगा

ये ऐसी चोट है जिस को हमेशा दुखते रहना है
ये ऐसा ज़ख़्म है जो उम्र भर अच्छा नहीं होगा

सहरा पे बुरा वक़्त मिरे यार पड़ा है

सहरा पे बुरा वक़्त मिरे यार पड़ा है
दीवाना कई रोज़ से बीमार पड़ा है

सब रौनक़-ए-सहरा थी इसी पगले के दम से
उजड़ा हुआ दीवाने का दरबार पड़ा है

आँखों से टपकती है वही वहशत-ए-सहरा
काँधे भी बताते हैं बड़ा बार पड़ा है

दिल में जो लहू-झील थी वो सूख चुकी है
आँखों का दो-आबा है सो बे-कार पड़ा है

तुम कहते थे दिन हो गए देखा नहीं उस को
लो देख लो ये आज का अख़बार पड़ा है

ओढ़े हुए उम्मीद की इक मैली सी चादर
दरवाज़ा-ए-बख़्शिश पे गुनहगार पड़ा है

ऐ ख़ाक-ए-वतन तुझ से मैं शर्मिंदा बहुत हूँ
महँगाई के मौसम में ये त्यौहार पड़ा है

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