ग़ज़लें -इब्राहिम ज़ौक-ज़ौक़ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Zauq Part 3

ग़ज़लें -इब्राहिम ज़ौक-ज़ौक़ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Zauq Part 3

दरिया-ए-अश्क चश्म से जिस आन बह गया

दरिया-ए-अश्क चश्म से जिस आन बह गया
सुन लीजियो कि अर्श का ऐवान बह गया

बल-बे-गुदाज़-ए-इश्क़ कि ख़ूँ हो के दिल के साथ
सीने से तेरे तीर का पैकान बह गया

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया

है मौज-ए-बहर-ए-इश्क़ वो तूफ़ाँ कि अल-हफ़ीज़
बेचारा मुश्त-ए-ख़ाक था इंसान बह गया

दरिया-ए-अश्क से दम-ए-तहरीर हाल-ए-दिल
कश्ती की तरह मेरा क़लम-दान बह गया

ये रोए फूट फूट के पानी के आबले
नाला सा एक सू-ए-बयाबान बह गया

था तू बहा में बेश पर उस लब के सामने
सब मोल तेरा लाल-ए-बदख़्शान बह गया

कश्ती सवार-ए-उम्र हूँ बहर-ए-फ़ना में ‘ज़ौक़’
जिस दम बहा के ले गया तूफ़ान बह गया

था ‘ज़ौक़’ पहले देहली में पंजाब का सा हुस्न
पर अब वो पानी कहते हैं मुल्तान बह गया

न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुआँ होता

न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुआँ होता
कि नीचे आसमाँ के और पैदा आसमाँ होता

कहे है मुर्ग़-ए-दिल ऐ काश में ज़ाग़-ए-कमाँ होता
कि ता शाख़-ए-कमाँ पर उस की मेरा आशियाँ होता

अभी क्या सर्द क़ातिल ये शहीद-ए-तुफ़्ता-जाँ होता
कोई दम शम-ए-मुर्दा में भी है बाक़ी धुआँ होता

न होती दिल में काविश गर किसी की नोक-ए-मिज़्गाँ की
तो क्यूँ हक़ में मिरे हर मू-ए-तन मिस्ल-ए-सिनाँ होता

अज़ा-दारी में है किस की ये चर्ख़-ए-मातमी-जामा
कि हबीब-ए-चाक की सूरत है ख़त्त-ए-कहकहशाँ होता

बगूला गर न होता वादी-ए-वहशत में ऐ मजनूँ
तो गुम्बद हम से सर-गश्तों की तुर्बत पर कहाँ होता

जो रोता खोल कर दिल तंगना-ए-दहर में आशिक़
तो जू-ए-कहकहशाँ में भी फ़लक पर ख़ूँ रवाँ होता

न रखता गर न रखता मुँह पे ये दाना मरीज़-ए-ग़म
मगर तेरा मयस्सर बोसा-ए-ख़ाल-ए-दहाँ होता

तिरे ख़ूनीं जिगर की ख़ाक पर होता अगर सब्ज़ा
तो मिज़्गाँ की तरह उस से भी पैहम ख़ूँ रवाँ होता

रुकावट दिल की उस काफ़िर के वक़्त-ए-ज़ब्ह ज़ाहिर है
कि ख़ंजर मेरी गर्दन पर है रुक रुक कर रवाँ होता

न करता ज़ब्त मैं गिर्या तो ऐ ‘ज़ौक़’ इक घड़ी भर में
कटोरे की तरह घड़ियाल के ग़र्क़ आसमाँ होता

निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी

निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी
चली थी बरछी किसी पर किसी के आन लगी

तिरा ज़बाँ से मिलाना ज़बाँ जो याद आया
न हाए हाए में तालू से फिर ज़बान लगी

किसी के दिल का सुनो हाल दिल लगा कर तुम
जो होवे दिल को तुम्हारे भी मेहरबान लगी

तो वो है माह-जबीं मिस्ल-ए-दीदा-ए-अंजुम
रहे है तेरी तरफ़ चश्म-ए-यक-जहान लगी

ख़ुदा करे कहे तुझ से ये कुछ ख़ुदा-लगती
कि ज़ुल्फ़ ऐ बुत-ए-बद-केश तेरे कान लगी

उड़ाई हिर्स ने आ कर जहाँ में सब की ख़ाक
नहीं है किस को हवा ज़ेर-ए-आसमान लगी

किसी की काविश-ए-मिज़्गाँ से आज सारी रात
नहीं पलक से पलक मेरी एक आन लगी

तबाह बहर-ए-जहाँ में थी अपनी कश्ती-ए-उम्र
सो टूट-फूट के बारे किनारे आन लगी

तुम्हारे हाथ से सीने में दिल से ता-बा-जिगर
सिनान ओ ख़ंजर ओ पैकाँ की है दुकान लगी

ख़दंग-ए-यार मिरे दिल से किस तरह निकले
कि उस के साथ है ऐ ‘ज़ौक़’ मेरी जान लगी

बर्क़ मेरा आशियाँ कब का जला कर ले गई

बर्क़ मेरा आशियाँ कब का जला कर ले गई
कुछ जो ख़ाकिस्तर बचा आँधी उड़ा कर ले गई

उस के क़दमों तक न बेताबी बढ़ा कर ले गई
हाए दो पलटे दिए और फिर हटा कर ले गई

ना-तवानी हम को हाथों हाथ उठा कर ले गई
च्यूँटी से च्यूँटी दाना छुड़ा कर ले गई

सुब्ह-ए-रुख़ से कौन शाम-ए-ज़ुल्फ़ में जाता था आह
ऐ दिल-ए-शामत-ज़दा शामत लगा कर ले गई

ख़ून से फ़रहाद के रंगीं हुआ दामान-ए-कोह
क्यूँ न मौज-ए-शीर ये धब्बा छुड़ा कर ले गई

तुम ने तो छोड़ा ही था ऐ हमरहान-ए-क़ाफ़िला
लेकिन आवाज़-ए-जरस हम को जगा कर ले गई

नोक-ए-मिज़्गाँ जब हुई सीना-फ़गारों से दो-चार
पारा-हा-ए-दिल से गुल-दस्ता बना कर ले गई

देखी कुछ दिल की कशिश लैला कि नाक़े को तिरे
सू-ए-मजनूँ आख़िरश रस्ता भुला कर ले गई

वाह ऐ सोज़-ए-दरूँ कूचे में उस के बर्क़-ए-आह
रात हम को हर क़दम मिशअल दिखा कर ले गई

वो गए घर ग़ैर के और याँ हमें दम भर के बाद
बद-गुमानी उन के घर सू घर फिरा कर ले गई

जो शहीद-ए-नाज़ कूचे में तुम्हारे था पड़ा
क्या कहूँ तक़दीर उसे क्यूँकर उठा कर ले गई

दश्त-ए-वहशत में बगूला था कि दीवाना तिरा
रूह-ए-मजनूँ बहर-ए-इस्तिक़बाल आ कर ले गई

आग में है कौन गिर पड़ता मगर परवाने को
आतिश-ए-सोज़-ए-मोहब्बत थी जला कर ले गई

ऐ परी पहलू से मेरे क्या कहूँ तेरी निगाह
दिल उड़ा कर ले गई या पर लगा कर ले गई

‘ज़ौक़’ मर जाने का तो अपने कोई मौक़ा न था
कू-ए-जानाँ में अजल नाहक़ लगा कर ले गई

मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करते

मज़ा था हम को जो लैला से दू-ब-दू करते
कि गुल तुम्हारी बहारों में आरज़ू करते

मज़े जो मौत के आशिक़ बयाँ कभू करते
मसीह ओ ख़िज़्र भी मरने की आरज़ू करते

ग़रज़ थी क्या तिरे तीरों को आब-ए-पैकाँ से
मगर ज़ियारत-ए-दिल क्यूँ कि बे-वज़ू करते

अजब न था कि ज़माने के इंक़िलाब से हम
तयम्मुम आब से और ख़ाक से वज़ू करते

अगर ये जानते चुन चुन के हम को तोड़ेंगे
तो गुल कभी न तमन्ना-ए-रंग-ओ-बू करते

समझ ये दार-ओ-रसन तार-ओ-सोज़न ऐ मंसूर
कि चाक-ए-पर्दा हक़ीक़त का हैं रफ़ू करते

यक़ीं है सुब्ह-ए-क़यामत को भी सुबुही-कश
उठेंगे ख़्वाब से साक़ी सुबू सुबू करते

न रहती यूसुफ़-ए-कनआँ की गर्मी-ए-बाज़ार
मुक़ाबले में जो हम तुझ को रू-ब-रू करते

चमन भी देखते गुलज़ार-ए-आरज़ू की बहार
तुम्हारी बाद-ए-बहारी में आरज़ू करते

सुराग़ उम्र-ए-गुज़िश्ता का कीजिए गर ‘ज़ौक़’
तमाम उम्र गुज़र जाए जुस्तुजू करते

मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला

मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला
दहान-ए-ज़ख़्म से ख़ूँ हो के हर्फ़-ए-आरज़ू निकला

मिरा घर तेरी मंज़िल-गाह हो ऐसे कहाँ तालए
ख़ुदा जाने किधर का चाँद आज ऐ माह-रू निकला

फिरा गर आसमाँ तो शौक़ में तेरे है सरगर्दां
अगर ख़ुर्शीद निकला तेरा गर्म-ए-जुस्तुजू निकला

मय-ए-इशरत तलब करते थे नाहक़ आसमाँ से हम
वो था लबरेज़-ए-ग़म इस ख़ुम-कदे से जो सुबू निकला

तिरे आते ही आते काम आख़िर हो गया मेरा
रही हसरत कि दम मेरा न तेरे रू-ब-रू निकला

कहीं तुझ को न पाया गरचे हम ने इक जहाँ ढूँडा
फिर आख़िर दिल ही में देखा बग़ल ही में से तू निकला

ख़जिल अपने गुनाहों से हूँ मैं याँ तक कि जब रोया
तो जो आँसू मिरी आँखों से निकला सुर्ख़-रू निकला

घिसे सब नाख़ुन-ए-तदबीर और टूटी सर-ए-सोज़ान
मगर था दिल में जो काँटा न हरगिज़ वो कभू निकला

उसे अय्यार पाया यार समझे ‘ज़ौक़’ हम जिस को
जिसे याँ दोस्त अपना हम ने जाना वो उदू निकला

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू

रिंद-ए-ख़राब-हाल को ज़ाहिद न छेड़ तू
तुझ को पराई क्या पड़ी अपनी नबेड़ तू

नाख़ुन ख़ुदा न दे तुझे ऐ पंजा-ए-जुनूँ
देगा तमाम अक़्ल के बख़िये उधेड़ तू

इस सैद-ए-मुज़्तरिब को तहम्मुल से ज़ब्ह कर
दामान ओ आस्तीं न लहू में लथेड़ तू

छुटता है कौन मर के गिरफ़्तार-ए-दाम-ए-ज़ुल्फ़
तुर्बत पे उस की जाल का पाएगा पेड़ तू

ऐ ज़ाहिद-ए-दो-रंग न पीर आप को बना
मानिंद-ए-सुब्ह-ए-काज़िब अभी है अधेड़ तू

ये तंगनाए-दहर नहीं मंज़िल-ए-फ़राग़
ग़ाफ़िल न पाँव हिर्स के फैला सुकेड़ तू

हो क़त्अ नख़्ल-ए-उल्फ़त अगर फिर भी सब्ज़ हो
क्या हो जो फेंके जड़ ही से उस को उखेड़ तू

जो सोती भीड़ बाइस-ए-ग़ौग़ा जगाए फिर
दरवाज़ा घर का उस सग-ए-दुनिया पे भेड़ तू

उम्र-ए-रवाँ का तौसन-ए-चालाक इस लिए
तुझ को दिया कि जल्द करे याँ से एड़ तू

आवारगी से कू-ए-मोहब्बत की हाथ उठा
ऐ ‘ज़ौक़’ ये उठा न सकेगा खखेड़ तू

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले
तुम आग लेने आए थे क्या आए क्या चले

तुम चश्म-ए-सुर्मगीं को जो अपनी दिखा चले
बैठे बिठाए ख़ाक में हम को मिला चले

दीवाना आ के और भी दिल को बना चले
इक दम तो ठहरो और भी क्या आए क्या चले

हम लुत्फ़-ए-सैर-ए-बाग़-ए-जहाँ ख़ाक उड़ा चले
शौक़-ए-विसाल दिल में लिए यार का चले

ग़ैरों के साथ छोड़ के तुम नक़्श-ए-पा चले
क्या ख़ूब फूल गोर पे मेरी चढ़ा चले

दिखला के मुझ को नर्गिस-ए-बीमार क्या चले
आवारा मिस्ल-ए-आहु-ए-सहरा बना चले

ऐ ग़म मुझे तमाम शब-ए-हिज्र में न खा
रहने दे कुछ कि सुब्ह का भी नाश्ता चले

बल-बे ग़ुरूर-ए-हुस्न ज़मीं पर न रक्खे पाँव
मानिंद-ए-आफ़्ताब वो बे-नक़्श-ए-पा चले

क्या ले चले गली से तिरी हम को जूँ नसीम
आए थे सर पे ख़ाक उड़ाने उड़ा चले

अफ़्सोस है कि साया-ए-मुर्ग़-ए-हवा की तरह
हम जिस के साथ साथ चलें वो जुदा चले

क्या देखता है हाथ मिरा छोड़ दे तबीब
याँ जान ही बदन में नहीं नब्ज़ क्या चले

क़ातिल जो तेरे दिल में रुकावट न हो तो क्यूँ
रुक रुक के मेरे हल्क़ पे ख़ंजर तिरा चले

ले जाएँ तेरे कुश्ते को जन्नत में भी अगर
फिर फिर के तेरे घर की तरफ़ देखता चले

आलूदा चश्म में न हुई सुरमे से निगाह
देखा जहाँ से साफ़ ही अहल-ए-सफ़ा चले

रोज़-ए-अज़ल से ज़ुल्फ़-ए-मोअम्बर का है असीर
क्या उड़ के तुझ से ताइर-ए-निकहत भला चले

साथ अपने ले के तौसन-ए-उम्र-ए-रवाँ को आह
हम इस सरा-ए-दहर में क्या आए क्या चले

सुलझाईं ज़ुल्फ़ें क्या लब-ए-दरिया पे आप ने
हर मौज मिस्ल-ए-मार-सियह तुम बना चले

दुनिया में जब से आए रहा इश्क़-ए-गुल-रुख़ाँ
हम इस जहाँ में मिस्ल-ए-सबा ख़ाक उड़ा चले

क़ातिल से दख़्ल क्या है कि जाँ-बर हो अपना होश
गर उड़ के मिस्ल-ए-ताएर रंग-ए-हिना चले

फ़िक्र-ए-क़नाअत उन को मयस्सर हुई कहाँ
दुनिया से दिल में ले के जो हिर्स-ओ-हवा चले

इस रू-ए-आतिशीं के तसव्वुर में याद-ए-ज़ुल्फ़
यानी ग़ज़ब है आग लगे और हवा चले

ऐ ‘ज़ौक़’ है ग़ज़ब निगह-ए-यार अल-हफ़ीज़
वो क्या बचे कि जिस पे ये तीर-ए-क़ज़ा चले

वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता

वो कौन है जो मुझ पे तअस्सुफ़ नहीं करता
पर मेरा जिगर देख कि मैं उफ़ नहीं करता

क्या क़हर है वक़्फ़ा है अभी आने में उस के
और दम मिरा जाने में तवक़्क़ुफ़ नहीं करता

कुछ और गुमाँ दिल में न गुज़रे तिरे काफ़िर
दम इस लिए मैं सूरा-ए-यूसुफ़ नहीं करता

पढ़ता नहीं ख़त ग़ैर मिरा वाँ किसी उनवाँ
जब तक कि वो मज़मूँ में तसर्रुफ़ नहीं करता

दिल फ़क़्र की दौलत से मिरा इतना ग़नी है
दुनिया के ज़र-ओ-माल पे मैं तुफ़ नहीं करता

ता-साफ़ करे दिल न मय-ए-साफ़ से सूफ़ी
कुछ सूद-ओ-सफ़ा इल्म-ए-तसव्वुफ़ नहीं करता

ऐ ‘ज़ौक़’ तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर
आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है

सब को दुनिया की हवस ख़्वार लिए फिरती है
कौन फिरता है ये मुर्दार लिए फिरती है

घर से बाहर न निकलता कभी अपने ख़ुर्शीद
हवस-ए-गर्मी-ए-बाज़ार लिए फिरती है

वो मिरे अख़्तर-ए-ताले की है वाज़ूँ गर्दिश
कि फ़लक को भी निगूँ-सार लिए फिरती है

कर दिया क्या तिरे अबरू ने इशारा क़ातिल
कि क़ज़ा हाथ में तलवार लिए फिरती है

जा के इक बार न फिरना था जहाँ वाँ मुझ को
बे-क़रारी है कि सौ बार लिए फिरती है

हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का

हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का
चश्मक है बर्क़ की कि तबस्सुम शरार का

मैं जो शहीद हूँ लब-ए-ख़ंदान-ए-यार का
क्या क्या चराग़ हँसता है मेरे मज़ार का

हो राज़-ए-दिल न यार से पोशीदा यार का
पर्दा न दरमियाँ हो जो दिल के ग़ुबार का

उस रू-ए-ताबनाक पे हर क़तरा-ए-अरक़
गोया कि इक सितारा है सुब्ह-ए-बहार का

है ऐन-ए-वस्ल में भी मिरी चश्म सू-ए-दर
लपका जो पड़ गया है मुझे इंतिज़ार का

पहुँचेगा तेरे पास कबूतर से पेश-तर
मकतूब-ए-शौक़ उड़ा के तिरे बे-क़रार का

हो पाक-दामनों को ख़लिश गर से क्या ख़तर
खटका नहीं निगाह को मिज़्गाँ के ख़ार का

बुझने की दिल की आग नहीं ज़ेर-ए-ख़ाक भी
होगा दरख़्त गोर पे मेरी चिनार का

देख अपने दर-ए-गोश को आरिज़ से मुत्तसिल
देखा न हो सितारा जो सुब्ह-ए-बहार का

पूछे है क्या हलावत-ए-तलख़ाबा-ए-सरिश्क
शर्बत है बाग़-ए-ख़ुल्द-ए-बरीं के अनार का

है दिल की दाओ घात में मिज़्गाँ से चश्म-ए-यार
है शौक़ उस की टट्टी की ओझल शिकार का

क़ासिद लिखूँ लिफ़ाफ़ा-ए-ख़त को ग़ुबार से
ता जाने वो ये ख़त है किसी ख़ाकसार का

ऐ ‘ज़ौक़’ होश गर है तो दुनिया से दूर भाग
इस मय-कदे में काम नहीं होशियार का

 

This Post Has One Comment

Leave a Reply