ग़ज़लें -इब्राहिम ज़ौक-ज़ौक़ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Zauq Part 2

ग़ज़लें -इब्राहिम ज़ौक-ज़ौक़ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Zauq Part 2

 

गुहर को जौहरी सर्राफ़ ज़र को देखते हैं

गुहर को जौहरी सर्राफ़ ज़र को देखते हैं
बशर के हैं जो मुबस्सिर बशर को देखते हैं

न ख़ूब ओ ज़िश्त न ऐब-ओ-हुनर को देखते हैं
ये चीज़ क्या है बशर हम बशर को देखते हैं

वो देखें बज़्म में पहले किधर को देखते हैं
मोहब्बत आज तिरे हम असर को देखते हैं

वो अपनी बुर्रिश-ए-तेग़-ए-नज़र को देखते हैं
हम उन को देखते हैं और जिगर को देखते हैं

जब अपने गिर्या ओ सोज़-ए-जिगर को देखते हैं
सुलगती आग में हम ख़ुश्क-ओ-तर को देखते हैं

रफ़ीक़ जब मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देखते हैं
तो चारागर उन्हें वो चारागर को देखते हैं

न तुमतराक़ को ने कर्र-ओ-फ़र्र को देखते हैं
हम आदमी के सिफ़ात ओ सियर को देखते हैं

जो रात ख़्वाब में उस फ़ित्नागर को देखते हैं
न पूछ हम जो क़यामत सहर को देखते हैं

वो रोज़ हम को गुज़रता है जैसे ईद का दिन
कभी जो शक्ल तुम्हारी सहर को देखते हैं

जहाँ के आईनों से दिल का आईना है जुदा
इस आईने में हम आईना-गर को देखते हैं

बना के आईना देखे है पहले आईना-गर
हुनर-वर अपने ही ऐब-ओ-हुनर को देखते हैं

चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए

चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए
जी ही जी में तिलमिलाना कोई हम से सीख जाए

अब्र क्या आँसू बहाना कोई हम से सीख जाए
बर्क़ क्या है तिलमिलाना कोई हम से सीख जाए

ज़िक्र-ए-शम-ए-हुस्न लाना कोई हम से सीख जाए
उन को दर-पर्दा जलाना कोई हम से सीख जाए

झूट-मूट अफ़यून खाना कोई हम से सीख जाए
उन को कफ़ ला कर डराना कोई हम से सीख जाए

सुन के आमद उन की अज़-ख़ुद-रफ़्ता हो जाते हैं हम
पेशवा लेने को जाना कोई हम से सीख जाए

हम ने अव्वल ही कहा था तू करेगा हम को क़त्ल
तेवरों का ताड़ जाना कोई हम से सीख जाए

लुत्फ़ उठाना है अगर मंज़ूर उस के नाज़ का
पहले उस का नाज़ उठाना कोई हम से सीख जाए

जो सिखाया अपनी क़िस्मत ने वगरना उस को ग़ैर
क्या सिखाएगा सिखाना कोई हम से सीख जाए

देख कर क़ातिल को भर लाए ख़राश-ए-दिल में ख़ूँ
सच तो ये है मुस्कुराना कोई हम से सीख जाए

तीर ओ पैकाँ दिल में जितने थे दिए हम ने निकाल
अपने हाथों घर लुटाना कोई हम से सीख जाए

कह दो क़ासिद से कि जाए कुछ बहाने से वहाँ
गर नहीं आता बहाना कोई हम से सीख जाए

ख़त में लिखवा कर उन्हें भेजा तो मतला दर्द का
दर्द-ए-दिल अपना जताना कोई हम से सीख जाए

जब कहा मरता हूँ वो बोले मिरा सर काट कर
झूट को सच कर दिखाना कोई हम से सीख जाए

वाँ हिले अबरू यहाँ फेरी गले पर हम ने तेग़
बात का ईमा से पाना कोई हम से सीख जाए

तेग़ तो ओछी पड़ी थी गिर पड़े हम आप से
दिल को क़ातिल के बढ़ाना कोई हम से सीख जाए

ज़ख़्म को सीते हैं सब पर सोज़न-ए-अल्मास से
चाक सीने के सिलाना कोई हम से सीख जाए

पूछे मुल्ला से जिसे करना हो सज्दा सहव का
सीखे गर अपना भुलाना कोई हम से सीख जाए

क्या हुआ ऐ ‘ज़ौक़’ हैं जूँ मर्दुमुक हम रू-सियाह
लेकिन आँखों में समाना कोई हम से सीख जाए

जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा

जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा
है अपना अपना मुक़द्दर जुदा नसीब जुदा

तिरी गली से निकलते ही अपना दम निकला
रहे है क्यूँ कि गुलिस्ताँ से अंदलीब जुदा

दिखा दे जल्वा जो मस्जिद में वो बुत-ए-काफ़िर
तो चीख़ उट्ठे मोअज़्ज़िन जुदा ख़तीब जुदा

जुदा न दर्द-ए-जुदाई हो गर मिरे आज़ा
हुरूफ़-ए-दर्द की सूरत हूँ ऐ तबीब जुदा

है और इल्म ओ अदब मकतब-ए-मोहब्बत में
कि है वहाँ का मोअल्लिम जुदा अदीब जुदा

हुजूम-ए-अश्क के हमराह क्यूँ न हो नाला
कि फ़ौज से नहीं होता कभी नक़ीब जुदा

फ़िराक़-ए-ख़ुल्द से गंदुम है सीना-चाक अब तक
इलाही हो न वतन से कोई ग़रीब जुदा

किया हबीब को मुझ से जुदा फ़लक ने मगर
न कर सका मिरे दिल से ग़म-ए-हबीब जुदा

करें जुदाई का किस किस की रंज हम ऐ ‘ज़ौक़’
कि होने वाले हैं हम सब से अन-क़रीब जुदा

Leave a Reply