गली से राजपथ पर-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

गली से राजपथ पर-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

ये गली सुनसान वर्षों से पड़ी थी
दूर तक
अपनी अभागिन धड़कनों का जाल बुनती हुई,
राजपप से उतरकर चुप
कल्पनाओं में अनागत यात्रियों के
पथों की आहटें सुनती हुई ।
ये गली
जिसके धड़कते वक्ष पर
थमे ज़ख्मी पाँव रखकर
दूर की उन बस्तियों को चले गये अनेक
औ’ उधर से
लौट पाया नहीं कोई एक,
आज तक रख बुद्धि और विवेक
जीवित है ।

आज लेकिन
आज
वर्षों बाद
झोपड़ों से
आहटें सुन पड़ रही हैं
गली में आने
गली ने राजपथ में पहुँच पाने के लिए
पगडंडियों से लड़ रही है हैं…

आहटें !
एक, दो, दस नहीं
अनगिन पगों की
रह-रह तड़पतीं
लड़खड़ातीं पर पास आती हुई
हर क्षण
बढ़ रही हैं…

अभी होगा भग्न
दैत्याकार यह वातावरण
एक मरणासन्न रोगी की तरह
अकुला रहा है मौन
पूछती है गली मुझसे बावली–
‘कवि !
राजपथ पर मा रहा है कौन ?’

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