गलीं असी चंगीआ आचारी बुरीआह-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

गलीं असी चंगीआ आचारी बुरीआह-सलोक-गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

गलीं असी चंगीआ आचारी बुरीआह ॥
मनहु कुसुधा कालीआ बाहरि चिटवीआह ॥
रीसा करिह तिनाड़ीआ जो सेवहि दरु खड़ीआह ॥
नालि खसमै रतीआ माणहि सुखि रलीआह ॥
होदै ताणि निताणीआ रहहि निमानणीआह ॥
नानक जनमु सकारथा जे तिन कै संगि मिलाह ॥२॥(85)॥

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