गर वोह नहीं होता तो ये मंज़र भी ना होता-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

गर वोह नहीं होता तो ये मंज़र भी ना होता-ग़ज़लें-ख़याल लद्दाखी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Khayal Ladakhi

गर वोह नहीं होता तो ये मंज़र भी ना होता
सहरा नहीं होते ये समन्दर भी ना होता

दुश्मन जो मिरी ज़ात के अक्सर नहीं होते
अपनों का सहारा मुझे दम भर भी ना होता

मज़हब मिरा उर्दू है मिरा दीन है उर्दू
होता ना ये मज़हब तो ये काफ़र भी ना होता

गर अबरू कमानी मिरे दिलबर की ना खिंचती
सीने के मिरे पार ये नश्तर भी ना होता

मैं फिर भी इसी अहद-ए-हक़ीक़ी को निभाता
कुछ फ़र्क नहीं मुझको पयम्बर भी ना होता

हर शै को किसी शै की ज़रूरत है हमेशा
साक़ी नहीं होता तो ये साग़र भी ना होता

ऐ काश मुझे ज़ीस्त अता ही नहीं होती
बरपा मरे आज़ार का दफ़्तर भी ना होता

हालात ख़्याल आज भी आज़ुरदा हैं मेरे
मरता भी नहीं और मैं बेहतर भी ना होता

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