गर धूप सलोनी जाड़े की!-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

गर धूप सलोनी जाड़े की!-डॉ. दिनेश चमोला शैलेश-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dr. Dinesh Chamola Shailesh

 

फूल खुशी के, मन क्यारी में
मृदु सपनों की फुलवारी में
नटखट स्वांग रचाते कैसे?
जीवन में यह मिली न होती
गर धूप सलोनी जाड़े की!

राजा रानी फिर क्या करते
खुद नाना नानी तक मरते
जीव-जंतु भी क्या बच सकते?
घर -आँगन मृदु खिली न होती
गर धूप सलोनी जाड़े की!

चिड़ियों का चह(चहा)ना ऐसे
भोरों का मंडराना जैसे
तितली का इतराना वैसे
होता कैसे, मिली न होती
गर धूप सलोनी जाड़े की!

नदिया, पोखर, ताल, तलैया
वन, पर्वत की जीवन लाली
आंगन-आँगन खुशियों के पल
झरते कैसे? मिली न होती
गर धूप सलोनी जाड़े की!

पंचम स्वर कोयल का गाना
ऋतु-पर्वों का बीन बजाना
जड़-चेतन का बन-ठन आना
होता कैसे ? खिली न होती
गर धूप सलोनी जाड़े की!

फूलों का खुश्बू फैलाना
बागों में अमिया बौराना
खुशियों की नव पींग बढ़ाना
संभव कैसे ? मिली न होती
गर धूप सलोनी जाड़े की!

रूप-रंग का महल सजाना
खशियों का यह गजब खजाना
जैव विविधता दुनिया भर की
मिलती कैसे ? खिली न होती
गर धूप सलोनी जाड़े की!

इस सुंदर भू पर आने को
अखिल विश्व को देखाने को
देव – सृष्टि ललचाती कैसे ?
जग को सुंदर, मिली न होती
गर धूप सलोनी जाड़े की!

 

Leave a Reply