गरिमा खण्डित होती है- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

गरिमा खण्डित होती है- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

रोज यहाँ मानवता की गरिमा खण्डित होती है
अबला के लाज लुटेरों से बेटी दण्डित होती है
इंसानों की बस्ती में लाज शरम सब खत्म हुए
दौर नया है अब बेशर्मी महिमामंडित होती है
चुन कर जिनको लाते हो जरा देखो कितने लायक हैं
बने वही व्यभिचारी हैं जो आज यहाँ जननायक हैं
जिन्हें गुलाब हम समझे थे वो निकले पेड़ बबूलों के
आज समझ लो ये जन नेता कितने पीड़ादायक हैं
इनकी नजरों में नारी का लेश मात्र सम्मान नहीं
जननी अनुजा बेटी सम रिश्तों का कोई ज्ञान नहीं
चलो उठो संकल्प करो इनको आज बता दें हम
सहन करेंगे हरगिज़ अब वनिता का अपमान नहीं

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