खोल आग़ोश न तू मुझ से रुकावट से लिपट-इंशा अल्ला खाँ ‘इंशा’ -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Insha Allah Khan Insha

खोल आग़ोश न तू मुझ से रुकावट से लिपट-इंशा अल्ला खाँ ‘इंशा’ -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Insha Allah Khan Insha

खोल आग़ोश न तू मुझ से रुकावट से लिपट
अब जो लिपटा है तो आ प्यार की करवट से लिपट

उस ने सर अपना धुना देख शिगाफ़-ए-दर से
कर के ग़श रह गए हम उस की जो चौखट से लिपट

धूम ये बादा-कशों की है कि मय-ख़ाने में
मस्त जाते हैं सुराही की ग़टा-ग़ट से लिपट

जों गली में मुझे आते हुए देखा तो वो शोख़
अपनी चौखट से उचक झट से गया पट से लिपट

शैख़ से ईद को क्यूँ आप हम-आग़ोश हुए
गोया जाता है भला ऐसे भी खूसट से लिपट

जिस को कहते हैं तराक़ी की फबन सो ज़ालिम
रह गई है तिरी चोली की फ़ँसावट से लिपट

पीस डाल आज तू मेरे भी फफूले दिल के
आ न आ मुझ से टुक ऐसी ही सजावट से लिपट

धम से हम दोनो गिरे फ़र्श पे हैं रूप कि रात
रह गया उन का दुपट्टा भी छपर-खट से लिपट

चोट खा कर लगी कहने कि अगर ऐसा है
है गला खेलना तुझ को तो किसी नट से लिपट

रा’द के साथ है ‘इंशा’ मिरे नाले का वो रूप
जैसे गुठ जाती हैं सुम दून में तिर्वट से लिपट

 

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