खेल तुम्हारा ठीक नहीं- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

खेल तुम्हारा ठीक नहीं- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

बचपन के आंगन में इठलाती किलकारी से मत खेलो
युवा भविष्य को आँख दिखाती बेकारी से मत खेलो
किसी अबला के रोते आँचल की लाचारी से मत खेलो
तुम जनमानस के उर में बसी हुई चिंगारी से मत खेलो
मत खेलो धर्म का खेल यहाँ किसी सच्चे भारतवासी से
मत खेलो दीन किसानों की आँखों में बसी उदासी से
सीमा रक्षा की ख़ातिर जो आठ प्रहर है अडिग खड़ा
सर्वस्व त्याग कर आया है जो मत खेलो उस सन्यासी से
मजलूमों और लाचारों से ये खेल तुम्हारा ठीक नहीं
जाति धरम के हथियारों से ये मेल तुम्हारा ठीक नहीं
अब खेल तुम्हारा ठीक नहीं है जनता के जज्बातों से
ऊँच नीच के अंगारों से ये खेल तुम्हारा ठीक नहीं

This Post Has One Comment

Leave a Reply