खेत के सब्ज़े में-यार जुलाहे-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

खेत के सब्ज़े में-यार जुलाहे-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

खेत के सब्ज़े में बेसुध सी पड़ी है दुबकी
एक पगडंडी की कुचली हुई अधमुई सी लाश
तेज़ कदमो के तले दर्द से कहराती है
दो किनारो पे जवां सिट्टो के चेहरे तककर
चुप सी रह जाती है ये सोच के बस
यूं मेरी कोख कुचल न देते राहगीर अगर
मेरे बेटे भी जवाँ हो गए होते अब तक
मेरी बेटी भी तो बयाहने के काबिल होती

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