खेंचो ज़बानें बर-सर-ए-शहीदान-ए-वफ़ा-अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

खेंचो ज़बानें बर-सर-ए-शहीदान-ए-वफ़ा-अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

 

खेंचो ज़बानें बर-सर-ए-बरबार ऐसों की ।
मेरा जो बस चले है सज़ा दार ऐसों की ।
दिल्ली में जो रपट सुने सरकार ऐसों की ।
नाहक को हम पि आ पड़े फिटकार ऐसों की ।
तकदीर फिर गई है तो कुछ अपना बस नहीं ।
इन पर दुहाई राम की खाना तरस नहीं ।

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