खुशा ज़मानते-ग़म-दस्ते-तहे-संग -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

खुशा ज़मानते-ग़म-दस्ते-तहे-संग -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

दयार-ए-यार तिरी जोश-ए-जुनूं पे सलाम
मिरे वतन तिरे दामन-ए-तार-तार की ख़ैर
रह-ए-यकीं तिरी अफ़साने-ख़ाक-ओ-ख़ूं पे सलाम
मिरे चमन तिरे ज़ख़मों के लालाज़ार की ख़ैर
हर एक ख़ाना-ए-वीरां की तीरगी पे सलाम
हर एक ख़ाक-ब-सर ख़ानमां-ख़राब की ख़ैर
हर एक कुशता-ए-नाहक की ख़ामशी पे सलाम
हरेक दीदा-ए-पुरनम की आब-ओ-ताब की ख़ैर
रवां रहे ये रवायत, ख़ुशा ज़मानत-ए-ग़म
निशात-ए-ख़तम-ए-ग़म-ए-कायनात से पहले
हर इक के साथ रहे दौलत-ए-अमानत-ए-ग़म
कोई नजात न पाये नजात से पहले
सुकूं मिले न कभी तेरे पा-फ़िगारों को
जमाल-ए-ख़ून-ए-सर-ए-ख़ार को नज़र न लगे
अमां मिली न कहीं तेरे जांनिसारों को
जलाल-ए-फ़रक-ए-सर-ए-दार को नज़र न लगे

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