खुले से बंधन बिखै भलो ही सीचानो जाते-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

खुले से बंधन बिखै भलो ही सीचानो जाते-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

खुले से बंधन बिखै भलो ही सीचानो जाते
जीव घात करै न बिकारु होइ आवयी ।
खुले से बंधन बिखै चकयी भली जाते
राम रेख मेटि निसि प्रिय संगु पावयी ।
खुले से बंधन बिखै भलो है सूआ प्रसिध
सुनि उपदेसु राम नाम लिव लावयी ।
मोख पदवी सै तैसे मानस जनम भलो
गुरमुखि होइ साधसंगि प्रभ ध्यावयी ॥१५४॥

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