खुला है दर प तिरा इंतेज़ार जाता रहा-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

खुला है दर प तिरा इंतेज़ार जाता रहा-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

खुला है दर प तिरा इंतेज़ार जाता रहा
ख़ुलूस तो है मगर एतेबार जाता रहा

किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही
मगर कभी जो हमें था ख़ुमार, जाता रहा

कभी जो सीने में एक आग थी वो सर्द हुई
कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा

अजब-सा चैन था हमको कि जब थे हम बेचैन
क़रार आया तो जैसे क़रार जाता रहा

कभी तो मेरी भी सुनवाई होगी महिफ़ल में
मैं ये उम्मीद लिए बार-बार जाता रहा

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